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BIOLOGY
जैव उर्वरकों पर एक निवन्ध लिखिए।...

जैव उर्वरकों पर एक निवन्ध लिखिए।

लिखित उत्तर

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खाद्य उत्पादन में वृद्धि के लिए रासायनिक उर्वरकों एवं पीडकलाशियों (Pesticides) का अन्धाधुन्ध प्रयोग किया जा रहा है, जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति नष्ट हो रही है। मृदा की उर्वरा शक्ति में वृद्धि के लिए जैवठवरक (Biofertilizers) का प्रयोग किया जा रहा है। "बे सूक्ष्म जीव जो मृदा की पेश्कता बढ़ाने में सहायक होते हैं, जैव उर्वरक (Binfertilizers) कहलाते है।" जैव उर्वरक सदा की उर्वरता को पाने के सच पनिजीकरण की क्रिया को भी तीव्र करते है। कुछ जीयापु नौल हरित शैचालें तथा कवके मुख्य जैव उर्वरक है। प्रमुख जैव उर्वरक के निम्नक्ति छः प्रकार  है 
(i)सहजीवी जीवाणु, रजोबियम-रोबियम जीवाणु दलहन जाति के पै की जड़ों में गाँठे बनाकर रहते हैं तथा पोषण प्राप्त करते है और वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को अमोनिया में बदलकर अपनी कोशिकाओं से बाहर निकाल देते हैं, जिसे पापापा भीधा प्राप्त करता है।
लाभ-राइजोबियम द्वारा प्रतिवर्ष 50-100 किग्रा/हैक्टेयर नादोजन का पीगिकीकरण किया जा सकता है। इसके प्रयोग से फसल को उपर में 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि होती है। साथ ही इसके बाद बोई जाने वाली फसलों में भी भूमि की उर्वरा शक्ति अधिक होने से पैदावार अधिक मिलती है। (ii) असहजीवी जीवाणु-कुछ अमनजीबी जीवाणु जैसे-एनोटोवैकटर, एनोस्पाइरिलम, क्लोस्ट्रीडियम पदा में उपस्थित मुक्त नाइट्रोजन का सिबरीकरण करके पौधों को उपलब्ध कराते हैं। ये जीवाणु भूमि में उपस्थित मुका नाइट्रोजन को अवशोषित करके कार्यानिक नाइट्रोजन को वैगिकों में बदल देते हैं। नाइट्रोजन बौगिक युक्त जीवाणुओं की मृत्यु होने पर अपघटक जीवाणु उनका अपघटन कर विणका अमोनिया को नाइट्राइट तथा अन्तत: नाइट्रेट में परिवर्तित कर देते हैं, जिसका उपयोग पौर्य द्वारा कर लिया जाना है।
लाभ-चावल, कपास, मक्का आदि फसलों के साथ एनोटोबेक्टर को उगाया जाता है, तो इसके उत्पादन में 90 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है।
(iii) नील हरित शैवाले या मायनोबैक्टीरिया
(i) नील हरित शैवालों द्वारा नाइट्रोजन यौगिकीकरण किया जाता क्रिय उनकी कोशिकाओं केरोसिस्ट (Heteroeysty में निफजीन (Nif mnt) द्वारा पूर्ण होती हा जैसे-एसबीना. नोस्टोक, प्लेक्टोनिमा मादि पोकरियोरिक असहनीवी जीव है, जो यह प्रक्रिया पूर्ण करते है।
लाभ-पान के खेत का वातावरण जैल हरित शैवाल की वृद्धि के लिए उपयुक्त होता है, जिससे धान की उपजा में वृद्धि होती है।
(ii) नील हरित शैवाल टेरिडोफाइट एजोला (Azolla) का प्रयोगदक्षिणी पूर्वी तथा दक्षिण एशिया में जैव उर्वरक के रूप में किया जा रहा है। जल में तैरने वाली इस फर्न की पर्ती में एनाबीना एजोली नामक नीलहरित शैवाल, वायु में उपस्थित नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करता है।
लाभ-एनाबीना पिन्नाटा जैव उर्वरक का एजोला के साथ प्रयोग करने से चावल के उत्पादन में 50 प्रतिशत की वृद्धि की जा सकती है। केन्द्रीय चावल अनुसंधान केन्द्र कटक मेंएनाबीना एजोली का व्यापक उत्पादन किया जा रहा है।
(iv) कवकमूल (Mycorrhiza)-कवकों का पौधों की जड़ों केसाथ सहजीवन को कवकमूल या माइकोराइजा करते हैं। लाभ-ये कवक भूमि से अवशोषित पोषक तत्व परपोषी को देताहै और बदले में परपोषी से पोषण प्राप्त करता है।
(v) फास्फेट विलयनकारी जीवाणु (Phosphate dissolvingbacteria)-कुछ जीवाणु जैसे—स्यूडोमोनास, माइक्रोबैक्टीरियम बैसिलिस आदि मृदा में उपस्थित अप्राप्य अकार्बनिक फास्फेट को प्राप्य कार्बनिक फास्फेट में परिवर्तित कर देते हैं। लाभ-इस प्रकार मृदा में उपस्थित अप्राप्य अकार्बनिक फास्फेट को प्राप्य कार्बनिक फास्फेट में बदलने से ये फास्फेट पादपों को आसानी से उपलब्ध हो जाता है।
(vi) कार्बनिक खाद (Organic manure)-भारत में उपलब्ध कार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों जैसे-घरेलू अपशिष्ट, शहरी अपशिष्ट, वाहित मल, फसलों के अपशिष्ट, पशुओं का मल-मूत्र, हड्डियों का चूरा आदि को सूक्ष्म जीवों द्वारा जैव अपघटन करवाकर कार्बनिक खाद्य के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि किस प्रकार से जैव उर्वरकों के उपयोग से फसल लागत को कम किया जा सकता है तथा दीर्घकालीन उत्पादन क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।
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