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Class 12
PHYSICS
परिपथ चित्र की सहायता से n-p-n. ट्रांजिस...

परिपथ चित्र की सहायता से n-p-n. ट्रांजिस्टर की दोलनी क्रिया समझाइए।

लिखित उत्तर

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डोलित्र -दोलित्र एक ऐसी युक्ति है जो दिष्ट धारा स्रोत की ऊर्जा का प्रयोग करके नियत आवृत्ति तथा आयाम की प्रत्यावर्ती वोल्टता उत्पन्न करती है।
ट्रांजिस्टर एक दोलित्र की भाँति-दोलित्र एक धनात्मक पुनर्भरण के साथ स्वयं पोषित ट्रांजिस्टर प्रवर्धक होता है। ट्रांजिस्टर दोलित्र के तीन प्रमुख भाग होते हैं- .
(i) टैंक परिपथ–यह परिपथ एक प्रेरकत्व (L) तथा धारिता (C) का 1 समान्तर-क्रम संयोजन होता है। यह परिपथ `f= (1)/(2pisqrt(LC))` आवृत्ति के अवमन्दित वैद्युत दोलन उत्पन्न करता है।
(ii) ट्रांजिस्टर प्रवर्धक-टैंक परिपथ से प्राप्त वैद्युत दोलनों की ट्रांजिस्टर प्रवर्धक पर निवेशी के रूप में आरोपित कर देते हैं, जिससे निर्गत के रूप में प्रवर्धित दोलन प्राप्त होते हैं।
(iii) पुनर्भरण परिपथ-ट्रांजिस्टर प्रवर्धक के निर्गत का एक भाग टैंक परिपथ को निवेशी सिंगनल की कला में लौटा देते हैं जो टैंक परिपथ में होने वाली ऊर्जा-हानि की पूर्ति करता है। यह क्रिया धनात्मक पुनर्भरण कहलाती है। धनात्मक पुनर्भरण के परिणामस्वरूप नियम आयाम के वैद्युत दोलन प्राप्त होते हैं।
परिपथ आरेख-ट्रांजिस्टर को दोलित्र के रूप में प्रयुक्त करने के लिए एक n-p-n ट्रांजिस्टर को चित्र में सर्वप्रथम एक प्रेरकत्व कुण्डली L तथा परिवर्ती संघारित्र के संयोग से टैंक परिपथ बनाते हैं। इसे ट्रांजिस्टर के उत्सर्जक परिपथ से जोड़ देते है। एक प्रेरकत्व कुण्डली `L_(1)`, बैटरी `V_(CC)` तथा कुंजी K को संग्राहक परिपथ में लगा देते हैं।
कार्यविधि-जैसे ही कुंजी K को दबाते है तो संग्राहक धारा `I_(C)` कुण्डली `L_(1)`, से होकर आगे जाने लगती है, जिसके कारण टैक परिपथ के प्रेरकल L से बद्ध चुम्बकीय पलक्स में परिवर्तन होने से कुछ प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार संधारित्र आवेशित होने लगता है। प्रेरित विद्युत वाहक बल के कारण उत्सर्जक आधार सन्धि अग्र अभिनत हो जाती है। अत: उत्सर्जक धारा `I_(E)` तथा संग्राहक धारा `I_(C)` पुन: बढ़ने लगती है। जब संग्राहक धारा `I_(C)` का मान बढ़ते-बढ़ते अपने संतृप्त मान तक पहुँच जाता है। तो संधारित्र पूर्णत: आवेशित हो जाता है।

जैसे ही संग्राहक धारा `I_(C)` का मान संतृप्त मान तक पहुँचता है। चुम्बकीय फ्लक्स परिवर्तन शून्य हो जाता है अर्थात् प्रेरित विद्युत वाहक बल का मान शून्य हो जाता है। इस प्रकार संधारित्र C तथा प्रेरकत्व कुण्डली L में विसर्जित होने लगती है। इस कारण संग्राहक धारा `I_(C)` का मान घटने लगता है। अतः प्रेरित विद्युत वाहक बल पहले से विपरीत दिशा उत्पन्न हो जाता है जो उत्सर्जक धारा `I_(E)` का विरोध करता है। इसके फलस्वरूप व `I_(E)` व `I_(C)` धाराएँ घटने लगती है और संधारित्र C निरावेशित हो जाता है। अत: संग्राहक धारा `I_(C)` शून्य हो जाती है। संधारित्र के आवेशित व निरावेशित की यह क्रिया निरन्तर चलते रहने से टैंक परिपथ में दोलन उत्पन्न हो जाते हैं। इन दोलनों को ऊर्जा बैटरी `V_(CC)` से प्राप्त होती रहती है तथा दोलनों को आवृत्ति `f = (1)/(2pisqrt(LC))` से ज्ञात की जाती है।
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