प्रत्येक पारिस्थितिक तंत्र में खाद्य श्रंखलाओ के माध्यम से ऊर्जा प्रवाह में दो मुख्य बाते ध्यान देने योग्य है-
(i) ऊर्जा का एकदिशीय प्रवाह अर्थात उत्पादक से विभिन्न श्रेणी के उपभोक्ताओं तक जिसे पूण: विपरीत दिशा में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है।
(ii) पोषण स्तर के बढ़ते कर्म में ऊर्जा प्रवाह की मात्रा उत्तरोत्तर घटती जाती है/ यह उत्पादक स्तर पर अधिकतम तथा चरम उपभोक्ता एवं अपघटक स्तर पर न्यूनतम होती है।
उत्पादक और ऊर्जा का आंशिक भाग (1-5%) ही अवशोषित करते है, इस ऊर्जा का बड़ा भाग श्वसन में व्यय हो जाता है व शेष से शरीर का निर्माण होता है। जब इन पादपों को अन्य शाकाहारी भोजन के रूप में लेते है, तो रासायनिक ऊर्जा का अधिकांश भाग पुन: श्वसन द्वारा तप ऊर्जा (लगभग 30%) में रूपांतरित हो जाता है व कुछ अंश उस प्राणी के शरीर में रह जाता है। मांसाहारियों के श्वसन में ऊर्जा का करीब 60% भाग खर्च होता है। यह क्रिया सतत आगे चलती रहती है तथा अंत में जीवो की मृत्यु पश्चात उनके शरीर में बची ऊर्जा (प्राथमिक उपभोक्ता) को खाकर मांसाहारी (द्वितीयक उपभोक्ता) में केवल 0.1 कैलोरी ऊर्जा संग्रहित होगी तथा अपघटक तक यह बहुत न्यून मात्रा में पंहुचेगी।
पारितंत्र में अनुपयोगी प्राथमिक उत्पादन, उपभोक्ताओं का असवनगीकृत भाग (यथा मलमूत्र आदि) अपरद में परिवर्तित हो जाते है, जो कि अपघटको के लिए ऊर्जा स्त्रोत का काम करते है। इस प्रकार पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा चक्र में भ्रमण न कर केवल प्रवाहित होती है, जिसे ऊर्जा प्रवाह कहते है। यह सदैव एकदिशीय होती है।
