अनुवांशिकी के जनक ग्रेगर जान मेण्डल है। अनुवांशिकता नियम अग्रलिखित है-
`1.`प्रभविता का नियम- किसी जीव में प्रत्येक लक्षण, दो कारको द्वारा व्यक्त होता है। यदि ये कारक प्रकट होते है, तो इसे प्रभावी तथा जो कारक प्रकट नहीं होते है, उसे अप्रभावी कारक कहते है। जैसे लम्बे पौधे और बौने पौधे में क्रॉस कराया जाए तो प्रथम पीठी में केवल लम्बे पौधे प्राप्त होते है । अतः लम्बेपन का कारक `("TT")` प्रभाव व् बौनेपन का कारक `("tt")`अप्रभावी होता है।
`2`. पृथकरण का नियम- पृथकरण का नियम- इस नियम के अनुसार युगमको के निर्माण के समय कारको (जीवो) के जोड़ो के कारक अलग-अलग हो जाते है और इनमे से केवल एक कारक ही एक युग्मक में जाता है, एक युग्मक के दोनों कारक एक साथ एक ही युग्मक में कभी भी नहीं जाते। इस सिद्धांत को युग्मको कि शुद्धता का सिद्धांत भी कहते है।
जब मटर के लम्बे तथा बौने पौधो के बीच सकरण कराया जाता है तो पहली पीढ़ी में सभी संकर लम्बे पौधे बनते है। लेकिन जब प्रथम पीढ़ी के पौधो में आपसी सकरण कराया जाता है तो दूसरी पीढ़ी में लम्बे तथा बौने पौधो के बीच का अनुपात प्राप्त होता है जो इस बात को प्रमाणित करता है कि युग्मको के निर्माण के समय जोड़े के जीन पृथक हो जाते है।
`3`.स्वतंत्र अपप्यूहान का नियम-इस नियम के अनुसार अनवांशिक लक्षणों के कारक परस्पर स्वतंत्र रहते है तथा स्वतंत्र रूप से अन्य सभी कारको से संयोग करते है। दिसंकर क्रॉस कि द्वितीय पीढ़ी में पिले रंग के बीजो के कारक, गोल बीजो के कारक के साथ संयोग नहीं करता है, बल्कि झुर्रीदार बीजो के कारक के साथ संयोग करता है।