मिलर तथा यूरे के प्रयोग का नामांकित चित्र- स्टेनले मिलर तथा हैराल्ड यूरे ने सन 1953 में जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जैव-रासायनिक सिद्धान्त (ओपेरिन वाद) के समर्थन में एक प्रयोग किया जिसे मिलर यूरे का प्रयोग कहते है। उन्होंने बड़े काँच के एक फ्लास्क में अमोनिया, मेथेन, हाइड्रोजन गैसों का 2 : 1 : 2 के अनुपात में भर दिया, क्योकि ये गैसे उस समय के वातावरण में इसी अनुपात में थी। एक अन्य फ्लास्क को काँच की नली द्वारा बड़े फ्लास्क से जोड़ दिया। इस छोटे फ्लास्क में पानी भरकर इसे निरन्तर उबालते रहने का प्रबन्ध भी कर दिया ताकि जलवाष्प पूरे उपकरण में घूमती रहे आदि वातावरण में कड़कती बिजली का वातावरण उत्पन्न करने के लिए बड़े फ्लास्क में टंगस्टन के बने दो इलेक्ट्रोड लगाये। इन इलेक्ट्रोडो के बीच 60,000 वोल्ट की विद्युत धारा को सात दिन तक प्रवाहित करके विद्युत चिंगारियाँ उत्पन्न की। फ्लास्क में बने गैसीय मिश्रण को ठण्डा करने के लिए संघनित्र का प्रयोग किया तथा प्राप्त द्रव को 'U' नली में एकत्र किया। प्रयोग के अन्त में 'U' नली में गहरा लाल रंग का द्रव बना, जिसका विश्लेषण करने पर इसमें ग्लाइसिन, ऐलेनिन तथा ऐस्पार्टिक अम्ल जैसे अमीनो अम्ल सहित शर्करा, वसीय अम्ल तथा अन्य कार्बनिक यौगिक पाये गये। ये सभी पदार्थ जीवद्रव्य में पाये जाते है। इस प्रयोग के आधार पर मिलर तथा यूरे ने ओपेरिनवाद या आधुनिकवाद का समर्थन करते हुए कहा कि आदि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के लिए अनुकूल वातावरण (अपचायक) था। चूँकि आज का वातावरण ऑक्सीकारक है। अतः जीवन की उत्पत्ति वर्तमान में सम्भव नहीं है।
इस प्रयोग से इस बात की पुष्टि हुई कि C, H, O तथा N के रासायनिक संयोग से महत्वपूर्ण विभिन्न जटिल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण आदि पृथ्वी पर हुआ होगा जो जैविक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
