पुनर्योगज डीएनए तकनीक (Recombinant DNA Tehnology ) - पुनर्योगज DNAप्राप्त करने के लिए तीन विधियाँ प्रयुक्त की गई है -
(अ) DNA की दो श्रृंखलाएँ जोड़कर - यदि हम एक DNA के सिरे पर कुछ क्षारक ( जैसे - TTTTT) जोड़ दे , तथा दूसरे DNA के सिरे पर इसके संयुग्मी क्षारक (AAAAAA) जोड़ दें और फिर दोनों प्रकार के DNA को मिलायें ,तो नई लड़ियाँ आपस में H - bond बनाकर दो भिन्न DNA अणुओं को संयुक्त कर देंगी । इस कार्य के लिए विशेष एंजाइम का उपयोग किया जाता हैं जिसे टर्मिनल ट्रांसफरेज (terminal transferase) कहते हैं ।
अनजुड़े स्थानों को डी.एन. ए . लाइगेज (DNA Ligase ) नामक एंजाइम व्दारा भर देते हैं ।
(ब) नियंत्रण एंजाइमों की सहायतो से ( with the help of Restriction Enzymes ) - इस विधि में संयुग्मी क्षारकों के बीच हाइड्रोडजन बंध बनाकर संकरित DNA का निर्माण करते हैं । परंतु इस विधि में एक विशेष एंजाइम , नियंत्रण एंजाइम (Restriction Enzymes) का उपयोग करते हैं । इस प्रकार के लगभग 100 एंजाइम अब उपलब्ध हैं । ये एंजाइम चाकू की तरह कार्य करते हैं तथा DNA श्रृंख्ला को विशिष्ट स्थानों पर इस प्रकार से काट देते हैं कि वांछित जीनों वाले खंड प्राप्त हो सकते हैं ।
उदाहरण के लिए , ई. कोलाई से ईको आर . आई . (Eco RI ) नामक नियंत्रण एंजाइम पृथक् किया गया हैं । यह DNA अणु में क्षारकों के निम्न क्रम को पहचान कर उसे G तथा A के मध्य काट देता हैं -
भिन्न - भिन्न स्रोतो से प्राप्त दो DNA के टुकड़ो को मिला दिया जाये तो संयुगमी बेस आपस में हाईड्रोजन आबंध बनाकर व्दिकुंडलित रचना बना लेते हैं । जो स्थान बिना जुड़े रहते हैं , उन्हे DNA लाइगेज की सहायता से जोड़ लिया जाता हैं , जैसा कि पहली विधि में किया गया था ।
स्पष्ट हैं कि Eco तथा DNA Ligase की सहायता से विभिन्न जीवों के जीनों को संयुक्त कराके संकरित जीन तैयार किये जी सकते हैं । संकरित जीन में दोनों ही जीवों के गुण उपस्थित होंगे । यहाँ तक कि ऐसे जीव , जिनमें कोई समानता नहीं हैं (हाथी और मनुष्य , चूहा और बंदर , टमाटर और आम) इत्यादि । यही नही पौधों और जंतुओं के बीच भी संकरण की संभावना बढ़ गई हैं ।
(स) क्लोनिंग (Cloning ) - यह विधि सबसे अधिक सरल तथा उपयोगी सिद्ध हुई है । आप जानते हैं कि कोशिकाओं में DNA का प्रतिकृतिकरण होता रहता हैं । परंतु यह भी तभी होता हैं जब स्वंय जीन इसका आदेश देता हैं । कोशिका में इन 'प्रतिकृतिकरण जीनों ' की संख्या बहुत कम होताी है । जैसे , कुछ जीवाणुओं के गुणसूत्र में 300 - 500 तक जीन होते हैं , परंतु 'प्रतिकृतिकरण जीन ' केवल एक ही होता हैं । इस जीन की एक विशेषता यह भी हैं कि यदि इसे मूल DNA से अलग करके किसी दूसरे DNA के साथ जोड़ दिया जाये तो यह उसकी प्रतिकृति करने लगता हैं । जीवाणुओं के प्लाज्मिड (plasmid) में भी यह जीन उपस्थित होता हैं । यही कारण है कि जिस जीवाणु कोशिकाओं में प्लाज्मिड होता हैं , वे तेजी से गुणन करती है ।
शरीर में प्रत्येक पदार्थ के संश्लेषण के लिए कोई निश्चित जीन उत्तरदायी होता हैं । यदि इस विशिष्ट जीन के साथ प्लाज्मिड के साथ पहले बताई विधियों व्दारा संकरित करा दिया जाये और इस संकरित DNA को पुनः जीवाणु की कोशिका में स्थापित करके उपयुक्त संवर्धन माध्यम में उगने दिया जाये , तो जीवाणु में वह जीन उसी पदार्थ का संश्लेषण करता हैं कि वह मूल शरीर में करता था । इस समस्त प्रक्रिया को क्लोनिंग कहते हैं । पोषी जीवाणु के लिए ई. कोलाई का उपयोग किया जाता हैं ।