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Class 12
PHYSICS
वान- डी-ग्राफ जनित्र का वर्णन निम्न-लिखि...

वान- डी-ग्राफ जनित्र का वर्णन निम्न-लिखिए शीर्षकों के अंतर्गत कीजिये-
(i) सिद्धांत (ii) संरचना (iii) नामांकित चित्र (iv) कार्य विधि (v) उपयोग।

लिखित उत्तर

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वान- डी - ग्राफ जनित्र (Van De Graph) - वह उपकरण या युक्ति जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है जनित्र या जनरेटर कहलाता है। सन 1929 में प्रोफेसर वान -डी ग्राफ ने ऐसे जनित्र का निर्माण किया, जिससे वाल्ट के क्रम का विभवांतर उत्पन्न किया जा सकता है। उन्ही के नाम पर इसे वान-डी-ग्राफ जनित्र कहा जाता है। ltgt सिद्धांत (Principle) - यह जनित्र निम्न सिद्धांत पर आधारित है-
(i) नुकीले भाग की क्रिया अर्थात संवहन विसर्जन (Corona discharge) - यदि किसी धन आवेशित चालक का कोई सिरा नुकीला है, तो नुकीले सिरे पर आवेश का पृष्ठीय घनत्व (Surface density of charge) अधिक होता है इस स्थिति में नुकीले भाग से वैद्युत पवन उत्पन्न हो जाता है जिसमे धनावेश होता है।
संरचना- वान- डी-ग्राफ की सैद्धांतिक संरचना चित्र में प्रदर्शित है। इसमें लगभग 5 सेमि व्यास का धातु का खोखला गोला S होता है, जो 15 मीटर ऊँचे विद्युत्रोधी संतभो PP पर टिका होता है। `P_(1)` तथा `P_(2)` दो घिरनियाँ होती है जिनमे से होकर विद्युत्रोधी पदार्थ जैसे -रबर या रेशम का बना एक बैल्ट (Belt) गुजरता है। नीचे की घिरनी को एक अन्य मशीन के द्वारा घुमाय जाता है जिससे बेल्ट उध्र्वाधर तल में तीर की दिशा में घूमने लगता है। `C_(1)` और `C_(2)` धातु की दो कंघियाँ होती है। `C_(1)` को फुहार कंघी (Spray comb) तथा `C_(2)` को संग्राहक कंघी (Collection Comb) कहते है। `C_(1)` का संबंध एक उच्च विभव बैटरी के धन ध्रुव से कर दिया जाता है, जिससे वह लगभग 10000 वोल्ट के धनत्मक विभव पर रह सके। कंघी `C_(2)` को गोला S से जोड़ दिया जाता है। D एक विसर्जन नलिका है।
गोले के आवेश के क्षय को रोकने के लिए जनित्र को लोगे के टैंकमें बंद करके रखते है जिसमे लगभग 15 वायुमंडलीय दाब पर वायु भरी होती है। लोहे के टैंक को भूसपर्किट कर दिया जाता है।
नामंकित चित्र- चित्र में वान-डी-ग्राफ जनित्र का नामांकित चित्र प्रदर्शित है।

कार्य विधि (Working) -फुहार कंघी `C_(1)` के नुकीले सिरों पर आवेश का पृष्ठ घनत्व अधिक होने के कारण इससे विद्युत पवन चलने लगती है। धनावेश युक्त इस वैद्युत पवन के कारण बेल्ट का सम्मुख भाग धनावेशित हो जाता है जो बेल्ट के साथ ऊपर की ओर चलता है, तो कंघी `C_(2)` पर ऋणावेश तथा गोले के पृष्ठ पर धनावेश प्रेरित कर देता है। कंघी `C_(2)` से पुन: ऋणावेशित वैद्युतपवन चलने लगती है जो बेल्ट के धनावेश को समाप्त करता है। इस प्रकार `C_(2)` से ऊपर जाने पर बेल्ट अनावेशित हो जाता है। यही प्रक्रिया लगातार चलती रहती है जिससे खोखला गोला सतत आवेशित होता रहता है जिससे विभवांतर लगभग 10 लाख वोल्ट तक या उससे अधिक बढ़ जाता है।
वान-डी -ग्राफ जनित्र की सहायता से प्रक्षेप्य कणो जैसे-प्रोटॉन, ड्यूटरों आदि को त्वरित किया जाता है। इसके लिए विसर्जन नली D का उपयोग किया जाता है जिसका ऊपरी सिरा S के अंदर होता है तथा निचला सिरा भूसंपर्कित होता है।
उपयोग (Uses) - (i) उच्च विभवांतर उत्पन्न करने में-
(ii) नाभिकीय भौतिकी के अध्ययन में।
(iii) प्रोटॉन, ड्यूटरों, `alpha-`कण आदि को त्वरित करके नाभिकीय विखंडन में।
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