वह डायनेमो जो यांत्रिक ऊर्जा को प्रत्यावर्ती धारा में परिवर्तन करता है उसे प्रत्यावर्ती धारा में परिवर्तन करता है उसे प्रत्यावर्ती धारा डायनेमो या जनरेटर कहते हैं।
संरचना- प्रत्यावर्ती धारा डायनेमो की संरचना चित्र में प्रदर्शित किया गया है। इसके मुख्य भाग निम्नलिखित हैं-
1 क्षेत्र चुम्बक, 2 आर्मेचर, 3 सर्पवलय, 4 ब्रुश।
1 क्षेत्र चुम्बक - यह एक नाल चुम्बक या विद्युत चुम्बक होता है जिसके ध्रुव बेलनाकार होते हैं।
2 आर्मेचर - यह एक कुंडली ABCD होती है, जो नर्म लोहे के क्रोड पर ताँबे के विद्युत रोधी तार को लपेटकर बनायीं जाती है। इसे चुम्बकीय ध्रुवों के मध्य एक धुरी पर किसी साधन से घुमाया जाता है। डायनेमो के घूमने वाले भाग को रोटर तथा भाग को स्टेटर कहते हैं।
3 सर्पवलय - आर्मेचर की कुंडली का सिरा धातु के एक-एक वलय `S_(1)` व `S_(2)` से जुड़ा रहता है। ये वलय आर्मेचर की धुरी के साथ जुड़े रहते हैं तथा साथ-साथ घूमते हैं किन्तु धुरी से विद्युतरुद्ध रहते हैं।
4 ब्रुश - ये कार्बन के बने होते हैं तथा सर्पी वलय को छूते रहते हैं। ये स्थिर होते हैं। बाह्य परिपथ के तार इन्ही ब्रुश `B_(1)` एवं `B_(2)` से जोड़ दिए जाते हैं।
कार्य-विधि - जब आर्मेचर ABCD को ध्रुव खण्डों NS के बिच एकसमान कोणीय वेग से दक्षिणावर्ती दिशा में घुमाया जाता है तो कुंडली से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है जिससे कुंडली में प्रेरित धारा बहती है। प्रथम अर्द्धचक्र में कुंडली में धारा की दिशा ABCD होती है, अतः बाह्य प्रतिरोध R में विद्युत धारा ब्रुश `B_(2)` से `B_(1)` की और प्रवाहित होती है जिसे चित्र (a) में प्रदर्शित किया गया है।
द्वितीय अर्द्धचक्र में कुंडली में धारा की दिशा DCBA होती है, अतः बाह्य प्रतिरोध R में विद्युत धारा ब्रुश `B_(1)` से `B_(2)` की और प्रवाहित होती है जिसे चित्र (b) में प्रदर्शित किया हाय है।
स्पष्ट है की बाह्य प्रतिरोध R में बहने वाली धारा की आवृत्ति आर्मेचर की आवृत्ति के बराबर होती है। सामान्यतः प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति 50 हर्ट्ज होती है।
