सिद्धान्त मानलो धारामापी की कुण्डली का प्रतिरोध G तथा शण्ट का प्रतिरोध S है। परिपथ में प्रवाहित होने वाली मुख्य धारा का मान I है । इसका `I_(g)` भाग धारामापी में से और `I_(s)` भाग शण्ट में से होकर प्रवाहित होता है ।
स्पष्ट है कि
`I=I_(g)+I_(s)` ....(1)
ओम के नियमानुसार,
धारामापी के सिरों के बीच विभवान्तर=`I_(g).G`
तथा शण्ट के सिरों के बीच विभवान्तर =`I_(g).S`
`because` धारामापी और शण्ट समान्तर क्रम में जुड़े हैं।
`thereforeI_(g).G=I_(s).S`
`(I_(s))/(I_(g))=G/S`
समी. (2) के दोनों पक्षों में जोड़ने पर,
`(I_(s))/(I_(g))+1=G/S+1`
या `(I_(s)+I_(g))/(I_(g))=(G+S)/S`
या `I/(I_(g))=(G+S)/S` [समी, (1) से मान रखने पर)
या `(I_(g))/I=S/(G+S)`
यदि मुख्य धारा का वोँ भाग धारामापी से प्रवाहित हो, तो
`(I_(g))/I=1/n`
`therefore1/n=S/(G+S)`
या nS=G+S
या nS-S=G
`thereforeS=G/(n-1)`
अर्थात यदि मुख्य धारा nवाँ भाग धारामापी में से प्रवाहित करना चाहते हैं, तो शण्ट के प्रतिरोध को धारामापी के प्रतिरोध का (n - 1) वाँ भाग होना चाहिए।
यही शण्ट का सिद्धान्त है
समी. (2) से स्पष्ट है कि
`I_(g)prop1/S` तथा `I_(g)prop1/G`
अत: शण्ट में बहने वाली धारा शण्ट के प्रतिरोध के व्युत्क्रमानुपाती तथा धारामापी में बहने वाली धारा धारामापी के प्रतिरोध के व्युत्क्रमानुपाती होती है।