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Class 11
PHYSICS
समान द्रव्यमान m के दो कण A तथा B जो एक ...

समान द्रव्यमान m के दो कण A तथा B जो एक सरल रेखा में एक-दूसरे की और क्रमशः +u तथा -u वेग से आ रहा है, टकराते है। संघट्ट के बाद इनके वेग क्या होंगे यदि संघट्ट (i ) पूर्णता प्रत्यास्थ (ii )पूर्णता अप्रत्यास्थ हो?

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The radius of base of solid cone is 9cm and its height is 21cm. It cuts into 3 parts by two cuts, which are parallel to its base. The cuts are at height of 7cm and 14 cm from the base respectively.What is the ratio of curved surface areas of top, middle and bottom parts respectively? एक ठोस शंकु के आधार की त्रिज्या 9 से.मी. है। तथा उसको ऊँचाई 21 से.मी. है। इसे दो कटाव, जो आधार के समांतर है से 3 भागों में काटा गया। कटाव आधार से क्रमशः 7 से.मी. तथा 14 से.मी. की ऊँचाई पर है। क्रमशः ऊपरी, मध्य तथा निचले भागों के बक्र पृष्ठीय क्षेत्रफल का अनुपात क्या हे?

A and B start moving towards each other from X and Y, respectively, at the same time on the same day. The speed of A is 20% more than the speed of B. After meeting on the way, A and B take p hours and 7 1/5 hours, respectively to reach Y and X respectively. What is the value of p? A और B एक हीदिन को एक ही समय में क्रमशः X और Y से एक दूसरे की ओर बढ़ने लगते है। A की चाल B की चाल से 20% अधिक है। रास्ते में मिलने के बाद A और B, क्रमशः Y और X तक पहुँचने के लिए p घंटे और 7 1/5 घंटे लेते है। p मान क्या है?

निम्नलिखित पद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मानव के लिए विचार तथा अनुभव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उदात्त है व इसका अथवा उसका नहीं है जातिगत अथवा देशगत नहीं है, वह सबका है, सारे विश्व का है। समस्त ज्ञान, विज्ञान और सभ्यता, सारी मानवता की विरासत है। पूर्व और पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के भेद, अक्षांश और देशान्तर का भेद तथा जलवायु और भौगोलिक सीमा के भेद सर्वथा निराधार हैं। सम्प्रदाय, समुदाय और जाति के नाम पर आदशौं, मूल्यों की स्थापना करना, संकीर्णता के वातावरण में मानवता के दम घोंटना-सा है। जो कुछ भी उपलब्धि है, वह चाहे जिस भू-भाग की उपज हो। महापुरुष विरोधी नहीं होते, एक-दूसरे के पूरक होते हैं। महापुरुष में अपने देश की विशेषता होती है। विवेकशील मनुष्य नम्रतापूर्वक महापुरुषों से शिक्षा ग्रहरण कर अपने जीवन को प्रकाशित करने का प्रयत्न करता है। समस्त मानवता उसके प्रति कृतज्ञ है। किन्तु अब हमें उनसे आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि ज्ञान की इतिश्री नहीं होती। संसार एक खुली पाठशाला है, जीवन एक खुली पुस्तक है, विकास की क्रिया के मूल में मानव की पूर्ण बनने की अपनी प्रेरणा है। विकास के लिए समन्वय का भाव होना परम आवश्यक है। यदि हम विभिन्न विचारधाराओं एवं उनके जन्मदाता महापुरुषों का पूर्ण खण्डन करें तो विकास अवरुद्ध हो जायेगा। किसी धर्म विशेष या मान्यता के खूटे के साथ संकीर्ण भाव से बंधकर तथा परम्पराओं और रूढ़ियों से जकड़े हुए हम आगे नहीं बढ़ सकते। मानव को मानव रूप में सम्मानित करके ही हम जातीयता, प्रान्तीयता, क्षुद्र राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता के भेद को तोड़ सकते हैं। आज मानव, मानव से दूर हटता जा रहा है। वह भूल चुका है कि देश, धर्म और जाति के भिन्न होते हुए भी हम सर्वप्रथम मानव हैं और समान हैं तथा सभी की भावनाएं और लक्ष्य एक ही हैं। सत्ताधारी मनुष्य दूसरों को कुचलकर सुख- सुवध ाओं पर एकाधिकार कर लेना चाहता है लेकिन एक आकाश के नीचे रहने वाले इन्सान तो सब एक हैं भले ही कोई कुदाल लेकर श्रमिका का कार्य करता हो, कोई कलम लेकर दफ्तर का, किन्तु लक्ष्य एक है- समाज का अभ्युदय। मानव का नाता श्रेष्ठ नाता है। नौकर कहकर पुकारना मानो मानव का अपमान है। सहयोगी, सहायक अथवा सस्नेह उसके नाम से सम्बोधित करना मधुर है। जेल और फांसी का विध र मानवता का कलंक है। एक सीमा एक दण्ड भी आवश्यक होता है, लेकिन दण्ड का आतंक समाज को पंगु बना देता है। हमें अपराध वृत्ति का शमन करके अपराधी को शिष्ट एवं सभ्य मानव बनाना चाहिए। दया मानवता का सार है। दया छोड़कर सत्य भी सत्य नहीं है। दया प्रेरित असत्य भी व्यावहारिक सत्य नहीं है। दया धर्म मानवधर्म हैं।विकास के लिए क्या आवश्यक है?