किसी स्प्रे पंप कि बेलनाकार नली कि अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल `8.0 cm^(2)` हैं। इस नली के एक सिरे पर 1.0 mm व्यास के 40 सूक्ष्म छिद्र हैं। यदि इस नाली के भीतर द्रव के प्रवाहित होने कि दर `1.5 m " min"^(-1)` हैं, तो छिद्रों से होकर जाने वाले द्रव कि निष्कासन-चाल ज्ञात कीजिये।
किसी स्प्रे पंप कि बेलनाकार नली कि अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल `8.0 cm^(2)` हैं। इस नली के एक सिरे पर 1.0 mm व्यास के 40 सूक्ष्म छिद्र हैं। यदि इस नाली के भीतर द्रव के प्रवाहित होने कि दर `1.5 m " min"^(-1)` हैं, तो छिद्रों से होकर जाने वाले द्रव कि निष्कासन-चाल ज्ञात कीजिये।
Similar Questions
Explore conceptually related problems
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये हम में से बहुत से लोगों के दिमाग में जो तरह-तरह के मुर्खतापूर्वक विचार आते हैं उन्हें दूर रखने के लिए किसी अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि की आवश्यकता नहीं है। यदि हम कुछ साधारण से नियमों का पालन करें तो सभी गलतियों से तो नहीं, लेकिन मूर्खतापूर्वक गलतियाँ करने से जरूर बच सकते हैं। यदि कोई मामला निरीक्षण करने से सुलझ सकता है तो हमें स्वयं निरीक्षण करना चाहिए। अरस्तु का यह सोचना था कि पुरूषों की तुलना में महिलाओं के दाँतों की संख्या कम होती है। इस गलती से बचने का एक साधारण-सा तरीका था कि वे अपनी पत्नी के दाँत गिन लेते। यह सोचना कि हम जानते हैं, जबकि वास्तव में हम नहीं जानते, एक बुरी आदत है जो हम में से बहुतों को होती है। लेखक का मानना है कि यह एक गम्भीर गलती है
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये हम में से बहुत से लोगों के दिमाग में जो तरह-तरह के मुर्खतापूर्वक विचार आते हैं उन्हें दूर रखने के लिए किसी अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि की आवश्यकता नहीं है। यदि हम कुछ साधारण से नियमों का पालन करें तो सभी गलतियों से तो नहीं, लेकिन मूर्खतापूर्वक गलतियाँ करने से जरूर बच सकते हैं। यदि कोई मामला निरीक्षण करने से सुलझ सकता है तो हमें स्वयं निरीक्षण करना चाहिए। अरस्तु का यह सोचना था कि पुरूषों की तुलना में महिलाओं के दाँतों की संख्या कम होती है। इस गलती से बचने का एक साधारण-सा तरीका था कि वे अपनी पत्नी के दाँत गिन लेते। यह सोचना कि हम जानते हैं, जबकि वास्तव में हम नहीं जानते, एक बुरी आदत है जो हम में से बहुतों को होती है। लेखक कहना चाहता है कि
साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। लेखक खेती के साथ-साथ लिखने का काम भी क्यों कर रहा है।
साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। शब्दों का कौन सा जोड़ शेष से भिन्न है?
साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। स्वार्थ को ताक पर रखकर जीते है:
साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। “किसान' से बना 'किसानी' शब्द है:
साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। लेखक को दिसंबर से लगाव है, क्योंकि:
साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। किसान अपने सुख-दुख को कब भूल जाता है?
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये हम में से बहुत से लोगों के दिमाग में जो तरह-तरह के मुर्खतापूर्वक विचार आते हैं उन्हें दूर रखने के लिए किसी अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि की आवश्यकता नहीं है। यदि हम कुछ साधारण से नियमों का पालन करें तो सभी गलतियों से तो नहीं, लेकिन मूर्खतापूर्वक गलतियाँ करने से जरूर बच सकते हैं। यदि कोई मामला निरीक्षण करने से सुलझ सकता है तो हमें स्वयं निरीक्षण करना चाहिए। अरस्तु का यह सोचना था कि पुरूषों की तुलना में महिलाओं के दाँतों की संख्या कम होती है। इस गलती से बचने का एक साधारण-सा तरीका था कि वे अपनी पत्नी के दाँत गिन लेते। यह सोचना कि हम जानते हैं, जबकि वास्तव में हम नहीं जानते, एक बुरी आदत है जो हम में से बहुतों को होती है। उपरोक्त गद्यांश का भावार्थ है कि कुछ साधारण से नियमों का पालन करने से
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये हम में से बहुत से लोगों के दिमाग में जो तरह-तरह के मुर्खतापूर्वक विचार आते हैं उन्हें दूर रखने के लिए किसी अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि की आवश्यकता नहीं है। यदि हम कुछ साधारण से नियमों का पालन करें तो सभी गलतियों से तो नहीं, लेकिन मूर्खतापूर्वक गलतियाँ करने से जरूर बच सकते हैं। यदि कोई मामला निरीक्षण करने से सुलझ सकता है तो हमें स्वयं निरीक्षण करना चाहिए। अरस्तु का यह सोचना था कि पुरूषों की तुलना में महिलाओं के दाँतों की संख्या कम होती है। इस गलती से बचने का एक साधारण-सा तरीका था कि वे अपनी पत्नी के दाँत गिन लेते। यह सोचना कि हम जानते हैं, जबकि वास्तव में हम नहीं जानते, एक बुरी आदत है जो हम में से बहुतों को होती है। उपरोक्त गद्यांश का शीर्षक होगा
Recommended Questions
- किसी स्प्रे पंप कि बेलनाकार नली कि अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल 8.0 cm^(...
Text Solution
|
- दिखाइए कि किसी त्रिभुज में भुजाओं के लम्ब अर्धक संगामी होते हैं |
Text Solution
|
- एक घनाकार सन्दूक के आयतन कि गणन में प्रतिशत त्रुटि ज्ञात कीजिये यदि घ...
Text Solution
|
- एक गुब्बारा जो सदैव गोलाकार रहता है, का व्यास (3)/(2)(2x+1) है इसके आ...
Text Solution
|
- एक नली में 12 सेमी.^(3)/से. कि दर से बालू उंडेली जा रही है। उंडेली गई ...
Text Solution
|
- किसी कारखाने में बने एक बल्ब कि 150 दिनों के उपयोग के बाद फ्यूज...
Text Solution
|
- किसी कारखाने में बने एक बल्ब कि 150 दिनों के उपयोग के बाद फ्यूज...
Text Solution
|
- एक त्रिभुज का एक शीर्ष (1,2) पर है तथा इससे होकर जाने वाली दो भुजाओं क...
Text Solution
|
- यदि वृत्त x^2 + y^2-8x-4y+c=0 के व्यास के एक सिरे के निर्देशांक (-3, ...
Text Solution
|