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Class 12
PHYSICS
वॉन – डी ग्राफ जनित्र की रचना एवं कार...

वॉन – डी ग्राफ जनित्र की रचना एवं कार्य विधि समझाइए। इसके उपयोग बताइए।

लिखित उत्तर

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(i) सिध्दान्त – हम जानते है। कि R त्रिज्या के किसी एकसमान खोलने गोल चालक की धारिता `C= 4 pi epsilon_(0)R ` होती है। स्पष्ट है कि धारिता अधिक हेाने के लिए चालक की त्रिज्या R अधिक होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त किसी आवेशित चालक के नुकीले बिन्दुओ पर आवेश पृष्ठ घनत्व अन्य समतल पृष्ठ की अपेक्षा अधिक होता है। अत: चालक के नुकीले बिन्दुओ के पास विघुत क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक तीव्र होता है।
(ii) नामंकित आरेख – आरेख 1.25 मे दिखाए।
(iii) संरचना - कुचालक स्तम्भों A एवं B के ऊपर धातु का 5 मीटर व्यास का गोला S स्थित रहता है। `P_(1) , P_(2)` घिरनियेां के ऊपर से एक कुचालक (रबा का ) वेल्ट बेल्ट FF गुजरता है। `C_(1)` कंघ को उच्च तनाव की बैटरी के धन सिरे से जोडते है। बैटरी का ऋण सिरा पृथ्वीकृत कर देते है। पूरा उपकरण फौलाद के प्रकोष्ठ D में बन्द रखते है।
(iv) कार्यविधि-धात्विक कंघी `C_(1)` को बैटरी के धन सिरे से जोड लेते है। जिससे कंघी के नुकीले सिरेां से धनावेशित विघुत पवन चलने लगता है। यह पवन बेल्ट के निकटवर्ती भाग को धनावेशित कर देता है। मोटर की सहायता से घिरनी `P_(1)` घुमती है। जिससे बेल्ट तीर की दिशा में चलता है। और बेल्ट के साथ धन आवेश ऊपन चलते है। जब ये आवेश `C_(2)` कंघी के पास होते है। तो प्रेरण की क्रिया से इस `C_(2)` कंघी को ऋण आवेशित कर देते है। अब `C_(2)` कंघी से ऋण आवेश का पवन चलता है। जो कंघी `C_(2)` के निकट के बेल्ट के धन आवेश को समाप्त कर देता है। और अनावेशित बेल्ट आगे चलकर पन: कंघी `C_(1)` के निकट पहुँच जाता है। यह क्रिया चलती रहती है। इस प्रकार कंघी `C_(2)` से लगातार ऋण आवेश विसरिता होते रहते है। ये इलेक्ट्रॉन गोले S से प्राप्त होते है। अत: S पर इलैक्टॉन की लगातार कमी होती जाती है। अर्थात इस पर धनावेश संचित होता जाता है। इस प्रकार गोले S का विभव 10000 बोल्ट या उसस भी अधिक हो जाता हे।
(v) उपयोग –(1) उच्च विभव प्राप्त करने में (2) आवेशित कणों `( alpha-` कण ड्रूयूटॉन आदि ) को त्वरित करने में।
(vi) देाष- बडे आकार के कारण इसका उपयोग असुविधाजनक है।
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