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PHYSICS
ठोसों में ऊर्जा बैण्डों के बनने को समझाइ...

ठोसों में ऊर्जा बैण्डों के बनने को समझाइए तथा इनके आधार पर चालक, कुचालक एवं अर्द्धचालकों में अन्तर को स्पष्ट कीजिए।

लिखित उत्तर

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हम जानते हैं कि किसी परमाणु में इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर बन्द कक्षाही मे चक्कर लगाते हैं। परमाण में इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा के सभी मान सम्भव नहीं हैं। केवल विविक्त मान ही सम्भव हो सकते हैं। कक्षा की बढ़ती संख्या (n = 1, 2, 3, ...) के क्रम में ही ऊर्जा के मान बढ़ते जाते हैं। n के दिये हए मान के लिए सभी इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा समान नहीं होती है। अन्य क्वाण्टम संख्याओं के आधार पर उनकी ऊर्जाओं में तनिक-सा अन्तर होता है। ये उपस्तर क्रमश: s, p, d एवं f होते हैं [ (a)] ।

जब दो परमाणुओं को एक-दूसरे के निकट लाते हैं, तो एक परमाणु का नाभिक दसरे के इलेक्ट्रॉनों की गति को प्रभावित करने लगता है तथा ऊर्जा-स्तरों का विभाजन होने लगता है क्योंकि दोनों परमाणु इस स्थिति में एक तन्त्र बना लेते हैं और पाउली के अपवर्जन सिद्धान्त के अनुसार, एक ही तन्त्र के दो इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा समान नहीं हो सकती है। दोनों परमाणु जितने अधिक निकट आयेंगे, ऊर्जा-स्तर का विभाजन उतना ही अधिक होगा [चित्र (b)] । परमाणुओं के बीच दूरी कम होने पर सर्वप्रथम सबसे बाहरी कक्षा से सम्बद्ध ऊर्जा-स्तरों का विभाजन होता है और विभाजन का यह क्रम अन्दर के स्तरों की ओर बढ़ता जाता है। ठोसों की रचना में लाखों की संख्या में परमाणु एक विशेष क्रम में एक-दूसरे के इतने निकट आ जाते हैं कि एक तन्त्र की रचना करते हैं। ऐसी दशा में प्रत्येक ऊर्जा-स्तर का उतने

ही उपस्तरों में विभाजन हो जाता है जितनी कि ठोस में परमाणुओं की संख्या है। इन ऊर्जास्तरों की ऊर्जा का अन्तर इतना छोटा होता है कि ऐसा प्रतीत होता है कि मानो ऊर्जा-स्तर तीक्ष्ण न रहकर फैल गया है। इस फैले हुए ऊर्जा-स्तर को ही हम ऊर्जा बैण्ड कहते हैं। प्रत्येक ऊर्जा- स्तर के संगत एक ऊर्जा बैण्ड बनता है। बैण्ड का बनना उच्च ऊर्जा स्तरों की ओर होता है। दो सतत् बैण्डों के बीच ऊर्जा के ऐसे भी मान होते हैं जिन्हें कोई इलेक्ट्रॉन प्राप्त नहीं कर सकता। इसे वर्जित ऊर्जा अन्तराल कहते हैं [ (b)]। वर्जित ऊर्जा अन्तराल की चौड़ाई ठोस की प्रकृति पर निर्भर करती है। वह उच्चतम ऊर्जा बैण्ड जिसमें सामान्यतः संयोजकता इलेक्ट्रॉन होते हैं, संयोजकता बैण्ड कहलाता है तथा इस बैण्ड से ऊपर वाले बैण्ड को चालन बैण्ड कहते हैं। संयोजकता बैण्ड तथा चालन बैण्ड के बीच वर्जित ऊर्जा अन्तराल हो भी सकता है और नहीं भी। यह ठोस की प्रकृति पर निर्भर करता है तथा इस आधार पर ठोस को तीन भागों में बाँटा जाता है।
वजित ऊर्जा अन्तराल के आधार पर चालक, कुचालक तथा अर्द्धचालकों में अन्तर
(i) चालक-चालकों में संयोजकता बैण्ड तथा चालन बैण्ड या तो एक-दूसरे से अतिव्यापित होते हैं या इनके बीच कोई वर्जित ऊर्जा अन्तराल नहीं होता है।
(ii) कुचालक-कुचालकों में संयोजकता बैण्ड तथा चालन बैण्ड के बीच वर्जित ऊर्जा अन्तराल की चौड़ाई काफी अधिक होती है। जैसे-डायमण्ड में इसका मान 7ev होता है।
(iii) अर्द्धचालक-अर्द्धचालकों में संयोजकता बैण्ड तथा चालन बैण्ड के बीच वर्जित ऊर्जा अन्तराल की चौड़ाई लगभग 1 eV के क्रम की होती है जो कुचालकों से काफी कम होती है। जैसे-Ge में इसका मान 0.67 eV तथा Si में 1.1 eV होता है।
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