अष्टम नियम - इस नियम का प्रतिपादन लुईस ने किया था। उनके अनुसार यदि किसी तत्व के संयोजी कोश में आठ इलेक्ट्रॉन है तब तत्व रासायनिक रूप से निष्क्रिय होता है। लेकिन यदि बाहरी कोश में इलेक्टॉन न हों तो परमाणु या अणु का निर्माण करते समय इलेक्ट्रॉन का आदान - प्रदान या साझा करके आठ इलेक्ट्रॉन पूर्ण करने का प्रयास करता है , यही अष्टम नियम कहलाता है। उदाहरण - `SF_(6), PCl_(5)" तथा "IF_(7)` जैसे यौगिक के संयोजी कोश में 12, 10 तथा 14 इलेक्ट्रॉन है। दूसरी ओर `BF_(3)" तथा " BeCl_(2)` के संयोजी कोश में क्रमश :6 तथा 4 इलेक्ट्रॉन है।
आवर्त सारणी के दूसरे तत्व जो संयोजी कक्षा में आठ से कम इलेक्ट्रॉन रखते है रासायनिक सक्रिय है। अतः जिनके संयोजी इलेक्ट्रॉन आठ से कम होते है सक्रिय होते है।
अष्टम नियम की सीमाएँ -
(i) केंद्रीय परमाणु का अपूर्ण अष्टम - कुछ यौगिकों में केंद्रीय परमाणु के चारों ओर उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या आठ से कम होती है। जैसे - `H : H, Li : Cl, H : Be : H`.
(ii) विषम इलेक्ट्रॉन अणु - उन अणुओं जिनमें इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या विषम होती है ये सभी परमाणु अष्टम नियम का पालन नहीं कर पाते।
`underset(.)overset(..)N =underset(..)overset (..)O " " underset(..)overset(..)O = overset(+)N - underset(..)overset(..)O:`
(iii) प्रसारित अष्टक - इन तत्वों के अनेक यौगिकों में केंद्रीय परमाणु के चारों ओर आठ से अधिक इलेक्ट्रॉन होते है इसे प्रसारित अष्टम कहते है।
(iv) उदासीन परमाणु से संबंधित धनायनों एवं ऋणायनों के बनने की सरलता।
(v) धनायनों एवं ऋणायनों को ठोस में व्यवस्थित होने की विधि अर्थात क्रिस्टलीय यौगिक का जालक निर्मित होने की विधि।