निर्माण -सल्फ्यूरिक अम्ल का औधोगिक निर्माण अधिकतर संपर्क विधि से किया जाता है जिसके लिए कच्चे माल के रूप में सल्फर अथवा आयरन पायराइटीज को लिया जाता है ।
सिद्धांत - शुद्ध एवं शुष्क `SO_(2)` तथा वायु के मिश्रण को उत्प्रेरक `V_(2)O_(5)` पर प्रवाहित करने से , वह `SO_(3)` में ऑक्सीकृत हो जाती है , जो जल से क्रिया करके `H_(2)SO_(4)` बनाता है ।
विधि - विधि का क्रमबृद्ध वर्णन निम्नलिखित है -
`(i)` सल्फर बर्नर - भट्टियों `(B)` में गंधक को जलाकर `SO_(2)` बनायी जाती है ।
`(ii)` धूल कक्ष - बनी हुई `SO_(2)` धूल कक्ष `D` से गुजरती है । यहाँ आने वाले वाष्पीय मिश्रण पर जल -वाष्प का फुहारा छोड़ा जाता है । भाप द्वारा भीगकर धूल के कण भारी हो जाती है और नीचे बैठ जाते है ।
`(iii)` शीतक पाइप - गैसीय मिश्रण अब शीतक पाइपों `C` से गुजरता है , जिससे ताप कम होकर `100^(@)C` हो जाता है ।
`(iv)` धोवन स्तम्भ - इस कक्ष `(W)` में क्वार्ट्ज के टुकङे भरे होते है और ऊपर से ठंडे पानी की फुहार चालू रहती है । गैसीय मिश्रण यहाँ से गुजरते समय उसमे बचे धूल के कण और जल में विलेय अशुद्धियाँ हट जाती है ।
`(v)` शुष्क स्तम्भ - ऊँचे बने हुए इस कक्ष `(D)` में क्वार्ट्ज के टुकड़े भरे होते है और ऊपर से सान्द्र गंधकाम्ल फुहारा चलता रहता है| गैसे इस कक्ष में नीचे से प्रवेश करती है । गंधकाम्ल के द्वारा गैसे शुष्क होकर आगे बढ़ती है ।
`(vi)` आर्सेनिक शोघक - इस `(P)` स्तम्भ में फेरिक हाइड्रॉक्साइड रहता है । गैसों में उपस्थित आर्सेनिक के ऑक्साइड यहाँ सोख लिए जाते है ।
`(vii)` परीक्षण कक्ष - इस प्रकार शुद्ध किया हुआ गैसीय मिश्रण सम्पर्क कक्ष में भेजने के पूर्व उसका परीक्षण किया जाता है । परीक्षण कक्ष `(T)` में प्रकाश की तेज किरण पुंज भेजी जाती है । यदि धूल आदि के कण हो तो वे चमक जाते है तब इस गैसीय मिश्रण को पुनः शुद्ध किया जाता है । पूर्ण शुद्ध और परीक्षित गैसीय मिश्रण अब गर्म कर (`H` द्वारा) सम्पर्क कक्ष `(R )` में भेजा जाता है ।
`(viii)` सम्पर्क कक्ष - यह लोहे, का बना एक बड़ा कक्ष `(R )` होता है जिसमे लोहे के कई पाइप होते है । इन पाइपों में उत्प्रेरक वेनेडियम पेण्टाक्साइड `(V_(2)O_(5))` या प्लैटिनम युक्त ऐस्बेस्टॉस या अन्य उपयुक्त उत्प्रेरक भरा रहता है । इनका ताप `450^(@)C` रखा जाता है । शुद्ध एवं परीक्षित सल्फर डाइऑक्साइड और हवा का गर्म मिश्रण इन पाइपों में उत्प्रेरक के सम्पर्क में रहकर आगे बढ़ता है और सल्फर ट्राइऑक्साइड `(SO_(3))` बनाता है ।
`2SO_(2)+O_(2)overset(Pt."ऐस्बेस्टॉस")underset(450^(@)C)(to)2SO_(3)+45000"कैलोरी "`
क्रिया ऊष्माक्षेपी होने से अब ताप स्वयं ही मिलने लगता है ।
`(ix)` अवशोषक स्तम्भ - बनी हुई सल्फ़र ट्राइऑक्साइड को सांन्द्र गन्धकाम्ल के फुहारे लगे कक्ष `(A)` में भेजा जाता है । गन्धकाम्ल `SO_(3)` अवशोषित होकर उसे और अधिक सान्द्र बनाती है । यह अम्ल `SO_(3)` की अधिकता के कारण कुहरा जैसी धूम्र से कक्ष भर जाता है । प्राप्त हुआ अम्ल सधूम गंधकाम्ल या ओलियम कहलाता है ।
`H_(2)SO_(4)+SO_(3)toH_(2)S_(2)O_(7)` ओलियम में आवश्यकतानुसार जल मिलाकर उससे वांछित सान्द्रता वाला गन्धकाम्ल प्राप्त कर लिया जाता है ।
`H_(2)S_(2)O_(7)+H_(2)O to 2H_(2)SO_(4)`
`SO_(3)` जल में तेजी से और सूं-सूं की आवाज के साथ घुलती है ।
