चित्र में साइक्लोट्रॉन की संरचना प्रदर्शित की गयी है। इसमें D-आकार के दो धात्विक चेम्बर हते हैं जिन्हें डीज कहा जाता है। इन डीज (`D_1` व `D_2`) के बीच गेप होता है जहाँ पर आवेशित कणों का स्रोत रखा जा सकता है। डीज का संबंध एक उच्च आवृत्ति दोलित्र से होता है। यह संपूर्ण व्यवस्था दो प्रबल चुंबकीय ध्रुव खंडों N व S के बीच में रखा होता है।
कार्य-विधि-मानलो किसी क्षण आयन स्रोत O से m द्रव्यमान तथा q आवेश का धनायन उत्पन्न होता है। माना इस क्षण `D_1` ऋणात्मक विभव पर तथा `D_2` धनात्मक विभव पर है अत: धनायन `D_1` की ओर त्वरित होता है तथा उसके अंदर प्रवेश कर जाता है। खोखले चालक `D_1` अंदर विद्युत् क्षेत्र शून्य होता है अत: उस पर केवल चुम्बकीय क्षेत्र ही कार्य करता है जो उसे वृत्तीय पथ में मोड़ देता है। `D_1` में अर्द्धवृत्तीय गति करने के पश्चात् धनायन पुनः विद्युत् क्षेत्र के संपर्क में आता है। विद्युत् क्षेत्र की आवृत्ति को इस प्रकार समायोजित किया जाता है कि ज्यों ही धनायन `D_1` से बाहर निकलता है, `D_2` ऋणात्मक विभव पर तथा `D_1` धनात्मक विभव पर आ जाता है। अब धनायन `D_2` की ओर त्वरित होता है।
यह त्रिज्या बार-बार दुहरायी जाती है तथा धनायन अत्यधिक त्वरित हो जाता है, फिर इसे खिड़की से बाहर निकाला जाता है एवं लक्ष्य पर टकराता है।
साइक्लोट्रॉन की सीमाएँ-
(i) साइक्लोट्रॉन की सहायता से इलेक्ट्रॉनों को त्वरित नहीं किया जा सकता इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान बहुत कम होता है। अत: थोड़ी-सी भी ऊर्जा देने पर उसकी चाल अत्यधिक बढ़ जाती है। फलस्वरूप उसकी आवृत्ति को दोलायमान विद्युत्-क्षेत्र की आवृत्ति के बराबर कर पाना सम्भव नहीं है।
(ii) साइक्लोट्रॉन की सहायता से अनावेशित कणों जैसे-न्यूट्रॉन आदि को त्वरित नहीं किया जा सकता।
(iii) साइक्लोट्रॉन में धनायन को एक निश्चित सीमा की चाल से अधिक त्वरित नहीं किया जा सकता।
