रचना - ट्रांसफार्मर के मुख्य तीन भाग होते है - पटलित क्रोड, प्राथमिक कुण्डली और दिव्तियक कुण्डली | नर्म लोहे की बनी कई आयताकार पाटितियाँ लेते है इनके बिच का आयताकार भाग काटकर अलग कर दिया जाता है | इन पतियों को विधुत-रोधी पदार्थ की तह देकर तथा इन्हे जोड़कर आवश्ययक मोटाई का बना लेते है | यह पटलित क्रोड कहलाता है | क्रोड के पटलित होने से भंवर-धाराओं का मन बहुत ही कम हो जाता है | क्रोड की दो सम्मुख भुजाओ पर ताम्बे के विहटरोधी तार की एक - एक कुण्डली लिपटी होती है |
इनमें से एक कुण्डली में मोटे तार के कम फेरे तथा दूसरी कुण्डली में पतले तार के अधिक फेरे होते है | जिस कुण्डली में फेरों की संख्या कम होती है, उसमें अधिक धारा प्रवाहित होती है | अतः इसकी कुण्डली मोटे टायर की बनाये जाती है |
जिस कुण्डली के सिरों पर प्रत्यावर्ती वैटेज लगाया जाता है, उसे प्राथमिक कुण्डली तथा दूसरी कुण्डली को दिव्तियक कुण्डली कहते है |
सिद्धान्त एवं कार्यविधि- ट्रांसफार्मर अन्योन्य प्राण के सिद्धांत पर कार्य करता है | जब इसकी प्राथमिक कुण्डली के सिरों के मद्य प्रत्यावर्ती विभवांतर लगाया जाता है, तो क्रोड में परिवर्ती चुमकिय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है | अतः प्रेरण की क्रिया से दिव्तीयाक कुंदकली में उसी आवृति की प्रत्यावर्ती धारा उत्पन्न हो जाती है |
मानलो प्राथमिक एवं दिव्तियक कुंडलियों में फेरों की संख्या क्रमशः `N_p` और `N_s` है | यदि किसी क्षण प्रहतमिक कुण्डली से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स `phi` हो, तो उसमें प्रेरित वि. वा. बल
`e_p = - N_p ""(d ph)/(dt)" ...(1)"`
यदि चुम्बकीय फ्लक्स मं क्षरण ण हो रहा हो तो दिव्तियक कुंली के बछ चुम्बकीय फ्लक्स भी `phi` होगा | अतः द्वितीयक कुण्डली में प्रेरित वि. वा. बल
`e_s = -N_s = (d phi)/(dt)" ...(2)"`
समीकरण (2) me समीकरण (1) का भाग देने पर,
` e_s / e_p = N_s/ N_p" ...(3)"`
यदि प्राथमिक कुण्डली का प्रतिरोध नगण्य हो, तो उसमें प्रेरित वि. वा. बल `e_p` उसके सिरे के बिच विभवांतर `E_s` के बराबर होगा |
इसी प्रकर दिव्तियक कुण्डली का प्रतिरोध नगण्य हो, तो उसमे प्रेरित वि. वा. बल `e_s` उसके सिरों के बिच विभवांतर `E_s` के बराबर होगा |
अतः समीकरण (3) से,
`E_S/E_P = N_S/ N_P" ...(4)"`
माना की किसी क्षण प्राथमिक एवं दिव्तियक कुण्डली में बहने वाली धाराएं क्रमशः `I_P`और `I_S` हो, तो आदर्श स्थिति में---
प्राथमिक कुण्डली में शक्ति = दिव्तियक कुण्डली में शक्ति
`E_p xx I_P = E_S xx I_S`
या `E_S/E_p = I_P/I_S" ...(5)"`
समीकरण (4) और (5) से स्पष्ट है की यदि `E_S lt E_P` तो `N_S lt N_P` तथा `I_P lt I_S`.
अतः अपचायी ट्रांसफार्मर `(E_S lt E_P)` की दिव्तियक कुण्डली में प्राथमिक कुण्डली की तुलना में चक्क्रों की संख्या कम होती है | अतः ट्रांसफार्मर धारा की प्रबलता को बड़ा देता है |
पुनः यदि `E_S gt E_P` तो `S_S gt N_P` तथा `I_P gt I_S`.
अर्थात उच्चायी ट्रांसफार्मर की द्वितीयक कुण्डली में प्राथमिक कुण्डली की तुलना में चक्क्रों की संख्या अधिक होती है | अतः ट्रांसफार्मर धारा की प्रबलता को बड़ा देता है |
समीकरण (4) और (5) से,
`N_S/N_P= E_S/ E_P=I_P/ I_S = K` ( एक नियतांक )
जहाँ, K को ट्रांसफार्मर का परिणमन अनुपात कहते है |
ट्रांसफार्मर के क्रोड पटलित बनाये जाते है