प्राइमेट मादाओं की प्रजनन अवस्था में अण्डाशय व सहायक नलिकाओं को एण्डोमेट्रियम में होने वाले चक्रीय परिवर्तन आतर्तव चक्र (Menstrual cycle) कहलाते हैं। एक स्त्री में आर्तव चक्र प्रत्येक 28/29 दिनों में दोहराया जाता है तथा एक ऋतु स्राव (मेंस्ट्रुअल fiow) से दूसरे तक की चक्रीय घटनाएँ मासिक चक्र कहलाती हैं। अण्डाशय व सहायक नलिकाओं में होने वाले परिवर्तन, हाइपोथैलेमस, पिट्यूटरी तथा अण्डाशयी हॉर्मोन्स के नियंत्रण में होते हैं। आर्तव चक्र में निम्न अवस्थाएँ क्रमिक रूप से आती हैं-ऋतुस्राव अवस्था, पुटिकीय अवस्था, अण्डोत्सर्ग, पीतकी अवस्था।
ऋतुम्राव अवस्था (Menstrual flow phase) 3 से 5 दिन तक चलने वाला ह्य अवस्था में गर्भाशयी एण्डोमेट्रियम के कुछ ऊतक, वहाँ की रक्त केशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने से निकला रक्त, कुछ म्यूकस आदि योनिद्वार से बाहर निकलते हैं। अण्ड का निषेधन
न होने पर व प्रोजेस्टेरॉन के अभाव के कारण गर्भाशयी लाइनिंग (एण्डोमेट्रियम) को बनाए रखना संभव नहीं होता, अत: वह कुछ रक्त के साथ शरीर से बाहर आ जाती है। इसी को ऋतु मानव जनन स्राव कहा जाता है।
(b) पुटिकीय प्रावस्था (Follicular stage) इस अवस्था को प्रचुरोद्भवन अवस्था (प्रोलिफरेटिव फेज) भी कहा जाता है। गर्भाशयी एन्डोमेट्रियम में ऋतु म्राव के कारण हुई क्षति (टूट-फूट) की भरपाई होती है। इससे एन्डोमेट्रियम मोटी व
ग्रन्थिल हो जाती है।
इस अवस्था में अण्डाशय में प्राथमक पुटक का ग्राफी पुटक के रूप में विकास होता है। अत: एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरॉन का स्तर बढ़ जाता है। यह अवस्था 5वें दिन से 13वें दिन तक चलती है।
अण्डोत्सर्ग अवस्था (Ovulation stage) अग्र पिट्यूटटी के ल्यूटीनाइजिंग हॉर्मोन (LH) का स्तर आर्तव चक्र के 14वें दिन अपने चरम पर होता है। इसे एल एच सर्ज कहा जाता है। इसी के प्रभाव से 14वें दिन अण्डोत्सर्ग होता है। इसका अर्थ है अण्ड (द्वितीयक ऊसाइट) ग्राफी पुटक व अण्डाशय से मुक्त हो जाता है।
पीतकी अवस्था (Luteal phase) या स्रावी अवस्था-स्रावी अवस्था 15वें दिन से 28वें दिन तक चलती है। ग्राफी पुटक अण्ड के निकल जाने के कारण पीत पिण्ड (कॉर्पस ल्यूटियम) में बदल जाता है। यह पिण्ड प्रोजेस्टेरॉन का स्राव करता है। इसी कारण इस अवस्था में प्रोजेस्टेरॉन स्तर अपने चरम पर होता है। इस हॉर्मोन के प्रभाव से गर्भाशयी एण्डोमेट्रियम और मोटी व ग्रन्थिल हो जाती है। वह हॉर्मोन उसे इसी रूप में बनाए रखने में मदद करता है। अधिक प्रोजेस्टेरॉन के फीडवैक प्रभाव से पिट्यूटरी हॉर्मोन स्तर कम हो जाता है अत: पुटिकीय विकास रुक जाता है।
अण्ड के निषेचित न होने पर कॉर्पस ल्यूटियम अपघटित हो जाती है अत: प्रोजेस्टेरॉन स्तर गिरने लगता है। प्रोजेस्टेरॉन के अभाव में एन्डोमेट्रियम का क्षरण प्रारम्भ हो जाता है जो परिचायक है।
अत: हाइपोथैलेमस के प्रभाव से निकले अग्र पिट्यूटरी हॉर्मोन FSH, LH तथा अण्डाशयी हॉर्मोन एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरॉन ऋतु स्राव चक्र का नियमन करते हैं।