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Class 12
BIOLOGY
नव - डार्विनवाद से आप क्या समझते हैं ?...

नव - डार्विनवाद से आप क्या समझते हैं ?

लिखित उत्तर

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नव-डार्विनवाद (Neo-Darwinism)- डार्विन के प्राकृतिक बरण बाद के प्रकाशन (1859) के बाद से चार दशकों तक वैज्ञानिक जगत में इस सिद्धान्त का दबदबा रहा। मेण्डल के नियमों की पुनर्खोज के बाद से वैज्ञानिकों ने डार्विनवाद पर सन्देह करना प्रारम्भ कर दिया। डार्विन ने मेण्डल के 'कारकों' (Factors) की आनुवांशिक भुमिका के सन्दर्भ में कुछ नहीं बोला। समष्टि में विभिन्नताओं का स्रोत क्या है, इस सम्बन्ध में डार्विन मौन रहे।
आनुवंशिकी के क्षेत्र में हुई प्रगति से डार्विनवाद को एक नया रूप मिला। इसी आधार पर नव-डार्विनवाद प्रस्तुत किया गया। इसी को जैव विकास का आथुनिक संश्लेषण वाद (Modern synthetic theory of evolution) कहा गया। इस वाद के अनुसार किसी समरष्टि में जैव विकास वंशागत होने वाली विभिन्नताओं पर प्राकृतिक वरण की प्रक्रिया द्वारा समर्टि के एलील संगठन में होने वाले परिवर्तनों के रूप में परिलक्षित होता है।
आधुनिक संश्लेषणवाद को डोब्जान्सकी (Dobzhansky) की पुस्तक"जेनेटिक्स एंड ऑरिजिन ऑफ स्पीशीज" से बल मिला। इसके प्रतिपादन में जूलियन हक्सले, हैल्डेन, मुलर फिशर, स्टेविंस, मायर व हार्डी वीनबर्ग का प्रमुख योगदान रहा।
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