रन्ध्रों के खुलने तथा बन्द होने की क्रिया, उनकी द्वार कोशिकाओं की स्फीति तथा श्लथ दशा पर निर्भर करती है तथा स्फीति दशा का सम्बन्ध उनके परासरण दाब में परिवर्तन होने से होता है। इसे समझने के लिए विभिन्न वैज्ञानिकों ने विभिन्न मत प्रस्तुत किये हैं, उनमें निम्नलिखित दो प्रमुख हैं
(1) स्टार्च-शर्करा परिवर्तन वाद (Starch-Sugar Interconversion Theory)-ये निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं
(a) दिन में-इस वाद के अनुसार दिन में श्वसन द्वारा मुक्त `CO_2`), प्रकाश-संश्लेषण में उपयोग कर ली जाती है जिससे रक्षक कोशाओं का माध्यम क्षारीय हो जाता है। इस उच्च pH की स्थिति में रात्रि में बना स्टार्च फॉस्फोराइलेज एन्जाइम की मदद से शर्करा में बदल जाता है। शर्करा जल में घुलनशील होता है जिससे द्वार कोशिकाओं का 0.P. बढ़ता है और कोशिका स्फीति दशा में आ जाती है। इस अवस्था में द्वार कोशाओं की पतली बाहरी भित्ति फैलती है, जिससे भीतरी मोटी भित्ति (बाहर की ओर) खिंचने लगती है और रन्ध्र खुल जाते हैं।
(b) रात्रि में रात्रि के समय श्वसन में बनी `CO_2`, का उपयोग नहीं होता और `CO_2`, रक्षक कोशाओं के कोशाद्रव्य में घुल जाती है जिससे कोशा का माध्यम अम्लीय (निम्न pH) हो जाता है। इस निम्न pH की स्थिति में दिन में बना शर्करा भी स्टार्च में परिवर्तित हो जाता
है। स्टार्च के पानी में अघुलनशील होने के कारण रक्षक कोशाओं का O.P. (परासरण दाब) कम हो जाता है। फलस्वरूप जल रक्षक कोशाओं से संलग्न सहायक कोशाओं में चला जाता है जिससे ये श्लथ (Flaccid) हो जाती हैं और छिद्र बन्द हो जाता है।
(2) सक्रिय `K^+` स्थानान्तरणवाद (Active `K^+` TransportTheory)- इस वाद का प्रतिपादन लेविट ने किया था। इस वाद को निम्नलिखित रेखाचित्र द्वारा दर्शाया जा सकता है
उपर्युक्त विवरणों से स्पष्ट है कि रन्ध्रों का खुलना और बन्द होना रक्षक कोशाओं की आशूनता (Turgidity) पर निर्भर करता है।
रात के समय कार्बनिक अम्ल स्टार्च में बदल जाते हैं। `K^+` रक्षक कोशिकाओं से बाहर आ जाते हैं जिससे उनका परासरण दाब कम हो जाता है। वह बहिःपरासरण द्वारा जल मुक्त कर श्लथ हो जाती है अतः स्टोमा बन्द हो जाता है।