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Class 11
BIOLOGY
मनुष्य में मूत्र निर्माण की क्रिया-विधि ...

मनुष्य में मूत्र निर्माण की क्रिया-विधि का वर्णन कीजिए |

लिखित उत्तर

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मूत्र निर्माण अथवा रक्त से यूरिया जैसे पदार्थों को छानने की क्रिया वृक्क की वृक्क नलिका में निम्नलिखित चरणों में पूर्ण होती है -
(1)अतिसूक्ष्म छनन - यह क्रिया नेफ्रॉन के वोमन सम्पुट में सम्पन्न होती है | ग्लोमेरुलस की कोशिकाओं एवं बोमन सम्पुट की भित्तियाँ एक-दूसरे से सटी हुई होती है तथा फ़िल्टर का कार्य करती है | बोमन सम्पुट की पोडोसाइट भी इसमें मदद करती है |
एफरेंट धमनिका का व्यास इफरेंट धमनिका से अधिक होता है अतः एफरेंट धमनिकाओं में रक्त दाब अधिक होता है | रक्त के प्लाज्मा में उपस्थित प्रोटीन व संपुट द्रव, छनन या निस्यंदन का विरोध करती है | लेकिन रक्त का दाब इस विरोध से कहीं अधिक होता है | अतः अधिक दाब के कारण ग्लोमेरुलस से रक्त में मिले यूरिया , यूरिक अम्ल, लवण, ग्लूकोज तथा दूसरे वर्ज्य पदार्थ छनकर बोमन सम्पुट में आ जाते है | बोमन सम्पुट में छनकर आये इन पदार्थों को ग्लोमेरुलस निस्यंद कहते है जो वृक्क नलिकाओं की आंतरिक सतह पर उपस्थित सिलिया की गति के कारण आगे बढ़ता है |
(2) पुनः अवशोषण - अतिसूक्ष्म छनन के क्रिया में उत्सर्जी पदार्थों के साथ कुछ उपयोगी पदार्थ, जैसे-जल, ग्लूकोज तथा आयतन, `Na^(+),K^(+),Ca^(++)` इत्यादि लवण के भी छानकर अलग कर दिया जाता है परन्तु ये पदार्थ शरीर के लिए उपयोगी होते है अतः इन्हें मूत्र के साथ बाहर न करके पुनः अवशोषित कर लिया जाता है | इनमें से अनेक पदार्थों को PCT (निकटस्थ कुण्डलित नलिका) तथा हेनले लूप द्वारा सक्रिय रूप से अवशोषित कर लिया जाता है | लवणों व आयनों के अवशोषित हो जाने पर जल परासरण द्वारा स्वयं अवशोषित हो जाता है | इस प्रकार निस्यंद का 90% जल वापस अवशोषित हो जाता है |

(3) स्रावण - ग्लोमेरुलस में छनने के बाद भी रक्त में कुछ उत्सर्जी पदार्थ शेष रह जाते है | यह उत्सर्जी पदार्थ सक्रिय रूप से वृक्क नलिका के भागों विशेष रूप से DCT में इन्टरस्टीशियल द्रव से मुक्त कर दिये जाते है | छनन , पुनः अवशोषण व स्रावण से वृक्क नलिका में गाढ़े मूत्र का निर्माण हो जाता है |
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