वर्नर के उप-सहसंयोजी सिद्धान्त को उदाहरण सहित समझाइए ।
लिखित उत्तर
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संकुल यौगिकों के निर्माण की व्याख्या करने हेतु अल्फ्रेड वर्नर ने सन 1893 में उप-सहसंयोजक सिद्धान्त (समन्वयन सिद्धान्त) का प्रतिपादन किया। इस सिद्धान्त की प्रमुख अवधारणाएँ निम्न हैं - (1) धातुओं की दो प्रकार की संयोजकताएँ होती हैं - (a) प्राथमिक संयोजकता - ये आयनिक होती है, इसे (.........) बिन्दुकित रेखा द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। (b) द्वितीयक संयोजकता - इसका आयनन नहीं होता इसे ठोस रेखा (-) द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। (2) धातु आयन की द्वितीयक संयोजकताओं की संख्या निश्चित होती है और यही संख्या उसकी समन्वयन संख्या (उप-सहसंयोजक संख्या) कहलाती है , जैसे - Cr की 6 है। (3) प्रत्येक धातु परमाणु अपनी प्राथमिक एवं द्वितीयक संयोजकताओं को संतृप्त करना चाहता है। (4) प्राथमिक संयोजकता ऋणायन द्वारा संतृप्त होती हैं, लेकिन द्वितीयक संयोजकताएँ ऋणायन अथवा अणुओं द्वारा संतृप्त होती है। (5) प्राथमिक संयोजकता धातु परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या एवं द्वितीयक संयोजकताएँ उप-सहसंयोजन संख्या को प्रदर्शित करती हैं। (6) द्वितीयक संयोजकताएँ त्रिविम में निश्चित दिशाओं में स्थित होती हैं। उदाहरण - Ni की उप-सहसंयोजन संख्या 4 है। यह चतुष्फलकीय या समतल वर्गाकार रूप से व्यवस्थित होती है।