मसाले (Spices) हिल (1952) ने मसालों की परिभाषा इस प्रकार दी है-"सामान्य रूप से शुष्क व कड़े पादप पदार्थ जिनमें सगंध तेल (Essential oil) उपस्थित हो, मसाले कहलाते हैं, जिनका प्रयोग चूर्ण रूप में किया जाता है।" इन्हें खाद्य अनुबंध (Food adjuncts) कहा जाता है। इनका प्रयोग भोजन को स्वादिष्ट, सुगन्धयुक्त, पाचक व पोषक बनाने के लिये किया जाता है। भारतीय मसालो का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है -
1. लॉंग (Clove) - इसका वानस्पतिक नाम - सिजीजियम ऐरोमेटिकम (Syzvgium aromaticum)
कुल - मिटेंसी (Myrtaceae) है।
उपयोगी पादप भाग- शुष्क पुष्प कलिकाएँ हैं।
लौंग ससीम पुष्पक्रम से उत्पन्न होते है। लौग अखुली पुष्प कलिकाओं को सुखाकर प्राप्त किया जाता हैं। लौंग में रुचिकर तीव्र गंध इसमें उपस्थित वाष्पशील तेल यूजिनोल (Euginol) की उपस्थिति के कारण होती है। लौंग गर्म मसाले का प्रमुख घटक है। वातहर होने के कारण इसका प्रयोग अजीर्ण तथा जठर खिंचाव में किया जाता है।
2. काली मिर्च (Black Pepper) इसका वानस्पतिक नाम पाइपर नाइग्राम जो पाइसिरेसी कुल का सदस्य है। काली मिर्च के अपरिपक्व शुष्क ड्रप को मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसे मुसालों का राजा कहा जाता है। इसका मसाले व औषधि के रूप में व्यापक उपयोग किया जाता है। इसे आयुर्वेदिक चूर्णों में घटक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
3. हल्दी (Turmeric)-मसालों का जिक्र हो तो महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह कुरकुमा लौंगा (Cureuma longa) वानस्पतिक नाम से जानी जाने वाली जिन्जीबरेसी कुल की सदस्य है। हल्दी के सुखाए हुए भूमिगत रूपान्तरित प्रकन्द (Rhizome) को मसाले के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसका उपयोग सब्जियों, अचार आदि के निर्माण में आवश्यक रूप से किया जाता है। यह एक प्रभावशाली रक्तशोधक औषधि है। इसके अलावा इसे चोट लगने पर त्वचा रोगों, सौंदर्य प्रसाधनों, सूती, रेशमी वस्त्रों को रंगने, धार्मिक व सांस्कृतिक उत्सवों में पवित्र पदार्थ के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। यह सद्दी, जुकाम, खांसी, पीलिया व दमा में अत्यन्त लाभकारी औषधि है।
4. लालमिर्च (Chillies)-यह कैप्सिकम एनुअम (Capsicum annuam) सोलेनेसी (Salanaceae) कुल की सदस्य है। इसके परिपक्व लाल शुष्क बेरी फल को मसाले के रूप में तथा कच्चे हरे फल सब्जी के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। लाल मिर्च का चूर्ण प्रमुख मसाला है। एशिया तथा अफ्रीकी देशों में इसका प्रयोग सब्जियों, नमकीनों, सास चटनियों व आचार में बहुतायत से किया जाता है।
5. सौंफ (Fennel) : इसका वानस्पतिक नाम फीनीकुलम वल्गैर (Foeniculum vulgare) है जो ऐपीएसी, या अम्बेलीफेरी कुल का सदस्य है। सौंफ के भिदुर फल (Schizocarpic) क्रीमोकार्प का प्रयोग मसाले के रूप में अचार, बिस्कुट व अन्य पदार्थ बनाने में किया जाता है।
6. धनिया (Coriander) : इसका वानस्पतिक नाम-कोरिएन्डरम सेटाइवम (coriandrum sativum है जो एपीएसी. या अम्बेलीफेरी कुल का सदस्य है तथा इसका परिपक्व क्रीमोकार्प फल व पत्तियाँ उपयोग की जाती हैं। इन शुष्क फलों के चूर्ण को मसाले के रूप में सब्जियाँ, कड़ी, चाट, चटनियाँ बनाने में प्रयोग किया जाता है।
7. जीरा (Cumin) : इसे क्यूमिनम साइमिनस (Cuminumcyminum) वानस्पतिक नाम से जाना जाता है जो कि एपीएसी, या अम्बेलीफेरी कुल का सदस्य है। इसका फल लम्बा, अण्डाकार तथा शुष्क, परिपक्व क्रीमोकार्प होता है। जो कि उपयोगी पादप भाग होने के कारण सब्जियों को तड़का (छौंक) लगाने व सगंधित आदि करने में प्रयोग होता है। भूने हुए जीरे के चूर्ण का उपयोग दही-बड़ों, जलजीरा व आयुर्वेदिक चूर्णों में किया जाता है।
৪. अजवायन (Lovage) जिसे ट्रेकीस्पर्मम ऐमी (Trachyspermum &mmi) वानस्पतिक नाम से जाना जाता है, यह ऐपीएसी,अम्बेलीफेरी कुल का सदस्य है। इसके भी शुष्क, परिपक्व क्रीमोकार्प फल को प्रयोग में लाया जाता है। अजवायन मसालों में प्रमुख स्थांन रखते हुए मठरी, पकौड़ी, बिस्कुट आदि के पकाने में प्रयुक्त होता है। प्रसव के उपरान्त प्रसूता को अजवायन के लड्डू खिलाये जाते हैं।