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BIOLOGY
मेण्डल के नियमों की पुनर्खोज करने वाले व...

मेण्डल के नियमों की पुनर्खोज करने वाले वैज्ञानिकों के नाम लिखिए।

लिखित उत्तर

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मेण्डल के नियमों के विचलन के अन्तर्गत निम्न नियम महत्त्वपूर्ण हैं जो कि विचलन नियम को प्रदर्शित करते हैं जैसे
(i) अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete Dominance)
दो विपरीत (तुलनात्मक) लक्षणों वाले कुछ पौधों में संकरण कराने पर `F_(1)` पीढ़ी में मध्यवर्ती लक्षण प्रकट होता है अर्थात् दो विपरीत लक्षणों में से कोई भी पूर्णतया प्रभावी लक्षण (dominant character) नहीं होताा दोगॉ लक्षण स्वयं को प्रदर्शित करते हैं। इस विशिष्टता को अपूर्ण प्रभाविता कहते हैं।
जब गुलाबाँस (4O'clock या Mirabilas jalapa) के लाल पुष्प वाले पौधे तथा सफेद पुष्प वाले पौधे के मध्य संकरण कराया गया, तब `F_(1)` पीढ़ी में गुलाबी पुष्प वाले पौधे उत्पन्न हुए। जब `F_(1)` पीढ़ी के पादपों में स्वपरागण कराया जाता है, तब `F_(2)` पीढ़ी में लाल, गुलाबी व सफेद पुष्प वाले पौधे 1 : 2:1 के अनुपात में प्राप्त होते हैं। अपूर्ण प्रभाविता में `F_(2)` पीड़ी का जीनोटाइप तथा फीनोटाइप अनुपात 1:2: 1 होता है।
(ii) सहप्रभाविता (Co-dominance) कुछ प्रयोगों में यह देखा गया कि दो विपरीत लक्षणों के संकरण के पश्चात् `F_(1)` पीढ़ी में दोनों ही लक्षण अपने आपको प्रकट करते हैं। इसे सहप्रभाविता कहते हैं।
अतः कह सकते हैं कि सहप्रभाविता में एक युग्मविकल्पी जोड़ों में विद्यमान दोनों प्रभावी एवं अप्रभावी कारक F) पीड़ी में लक्षण को प्रकट करने में समान रूप से योगदान करते हैं। इस प्रक्रिया को सह प्रभाविता . कहते हैं।
इस प्रकार में युग्मविकल्पी (Allele) जोड़े के जीन एक-दूसरे के लिए प्रभावी या अप्रभावी न होकर `F_(1)` संकरों में दोनों लक्षणों को समान रूप से अभिव्यक्त करते हैं। अत: सह-प्रभावी जीन वाले विषय युग्मजी में दोनों जोन लगभग साथ-साथ प्रकट होते हैं। ये पृथक्करण के नियम का पालन करते हैं और `F_(2)` पीढ़ी में समजीनी व समलक्षणी के रूप में 1:2:1 के अनुपात में होते हैं।
(ii) बहुविकल्पी ऐलील (Multiple alleles)
सामान्य एक जीन के दो प्ररूप होते हैं जैसे लंबा या छोटा (बौना), लाल या सफेद, भूरी आँखें या नीली आँखें आदि। ये जीन युग्मविकल्पी (Allele) भाग के दो प्रकार हैं। परन्तु अधिकांश जीन के दो से अधिक प्रकार के ऐलील होते हैं उन्हें बहयग्मविकल्पी /Multiple Allele) कहते हैं। इसका उदाहरण मानव में रक्त समूह की वंशागति होता है।
मनुष्य में चार रक्त समूहों का एक एकल जीन द्वारा निर्धारण किया जाता है। इस एक जीन के तीन एलीग्स `I^(A)`, `I^(A)`, और i होते हैं। समूह के ऐलील IA व IB दोनों प्रभावी है। अत: IA व IB अलील दोनों से युक्त रक्त समूह AB होता है क्योंकि IA व IB दोनों समूह सह प्रभावी होते हैं। जीन `I_(O)` जब समयुग्मजी होता है तो रक्त समूह.O होता है मानव रक्त समूहों के जीनोटाइप व फीनोटाइप नीचे चित्र द्वारा बताये गये हैं-
(iv) बहुप्रभाविता (Plelotropy) सामान्यतया कोशिकीय स्तर पर एक जीन का प्रभाव एक प्रकार से हो सकता है। यह एक जीन एक कार्य के लिये निर्धारित होता है किन्तु कुछ जीन एक से अधिक लक्षणों पर अपना प्रभाव दर्शाते हैं तो वह प्रभाव बहुप्रभाविता कहलाता है। इसके लिये बहुप्रभावी जीन निर्धारित रहते हैं।
अत: ऐसे जीन जो एक से अधिक लक्षणों अथवा विशेषकों को निर्धारित करते हैं, उन्हें बहुप्रभावी जीन कहते हैं। एक जीन के कई ऐलील हो सकते हैं और बहुत से जीनोटाइप हो सकते हैं। एक जीन कई जीनोटाइप को नियंत्रित कर सकता है। उदाहरण-ड्रोसोफिला में सफेद आँख के लिये अप्रभावी जीन समयुग्मजी स्थिति में विद्यमान होने पर कई और लक्षणों को प्रभावित करता है जैसे: पंखों की आकृति, उदर की आकृति। अत: सफेद आँख वाले ड्रोसोफिला में अवशेषी पंख और उदर कुंडलित पाये जाते हैं।
बहु प्रभाविता का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उदाहरण वंशागत रोग, सिकल __ सेल एनीमिया. (Sickel-cell anaemia) की वंशागति में मिलता है। यह रोग एक अप्रभावी जीन के कारण होता है।
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