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BIOLOGY
गुणसूत्रों में संरचनात्मक परिवर्तनों का ...

 गुणसूत्रों में संरचनात्मक परिवर्तनों का विस्तृत विवरण कीजिए।

लिखित उत्तर

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जब गुणसूत्र की जीन व्यवस्था में कोई अन्तर आ जाये या उनमें कोई अतिरिक्त जीन जुड़ जाये अथवा कुछ जीन लुप्त हो जायें, तब उसे गुणसूत्र उत्परिवर्तन अथवा गुणसूत्रीय विपथन कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं
(1) गुणसूत्रों में संख्यात्मक परिवर्तन (2) गुणसूत्रों में संरचनात्मक परिवर्तन। _गुणसूत्रों में संरचनात्मक परिवर्तन (Structural changes in chromosomes) दूसरे प्रकार के उत्परिवर्तन में गुणूसत्र में रचनात्मक परिवर्तन हो जाता है। इससे गुणसूत्र का मूल व्यवहार या प्रकृति बदल जाती है। इसलिए इसे गुणसूत्रीय विपथन कहा जाता है।गुणसूत्रीय विपथन मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं
(अ) विलोपन (Deletion) यह सबसे सरल प्रकार का गुणसूत्रीय विपथन माना जाता है। किसी गुणसूत्र के बड़े या छोटे अकेन्द्रकीय खंड की कमी अथवा हानि होना विलोपन कहलाता है। यदि किसी गुणसूत्र के अन्तस्थ भाग की कमी होती है तो इसे अन्तस्थ हीनता (Terminal deletion) कहते हैं। जबकि बीच अथवा अंतर्वेशी खंड का दो भागों से टूटना अन्तराली (Interstitial deletion) कहलाती है। अर्थात् उस गुणसूत्र से खोए हुए हिस्से के जीन विलोपित हो जाते हैं। इस प्रकार के उत्परिवर्तन में यदि दो समजात गुणसूत्रों में से किसी एक का कुछ हिस्सा विलोपित हो जाता है तो इसमें दूसरे गुणसूत्र का अप्रभावी जीन अपनी अभिव्यक्ति करता है। यदि विलोपन दोनों गुणसूत्रों में हो जाए तो परिणाम घातक भी हो सकते हैं।
(ब) स्थानांतरण (Translocation)-जब किसी गुणसूत्र का एक सिरे की ओर से टूटा हुआ हिस्सा उसी गुणसूत्र के दूसरे सिरे से जुड़ जाए अथवा किसी अन्य असमजात गुणसूत्र से जुड़ जाए तो उसे ट्रान्सलोकेशन प्रकार का विपथन कहते हैं। एकपाश्विक (Unilateral) स्थानान्तरण में एक गुणसूत्र से गुणसूत्र खंड दूसरे गुणसूत्र में जाता है। परन्तु दोनों दिशाओं में आदान-प्रदान नहीं होता है। इसके विपरीत द्विपाश्विक (Bilateral) स्थानान्तरण में गुणसूत्र खंडों का आदान-प्रदान दोनों तरफ होता है। यदि खडा का स्थानान्तरण दा असमजात गुणसूत्र के मध्य पारस्परिक हो तो इसे पारस्परिक स्थानान्तरण (Reciprocal translocation) कहते हैं।इस प्रक्रिया में भी स्थान प्रभाव (Position effect) के कारण संतति के लक्षण रूप में परिवर्तन आ सकता है। कभी-कभी दो असमजात गुणसत्रों के टूटे हुए हिस्से परस्पर एकदूसरे से जुड़कर अर्थात् स्थानान्तरित होकर दो समजात गुणसूत्र निर्मित कर देते हैं।
(स) प्रतिलोम व्युत्कमण (Inversion)-प्रतिलोमन में गुणसूत्र का एक भाग उल्टे क्रम में पुन: व्यवस्थित हो जाता है। इसमें गुणसूत्र पहले दो बिन्दुओं पर खंडित हो जाता है तथा यह टूटा हुआ खण्ड 180 डिग्री पर घूम जाता है तथा घूमे हुए भाग पुनः मिल जाते हैं। इस प्रकारजीनक्रम व्युत्क्रमित हो जाता है। इस स्थिति में उस गुणसूत्र का जीनी प्ररूप तो अपरिवर्तित रहता है किन्तु संतति के लक्षण प्ररूप में परिवर्तन आ जाता' है। चूँकि इस प्रक्रिया में जीन लोकस में परिवर्तन आता है, इसे स्थान प्रभाव भी कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है
1. पराकेन्द्री (Paracentral)—इस तरह के प्रतिलोमन में सेन्ट्रोमियर प्रतिलोमित खंड के बाहर लगा हुआ रहता है।
2. परिकेन्द्री (Pericentral) इस प्रकार के प्रतिलोमन में प्रतिलोमित खंड में सेन्ट्रोमियर उपस्थित रहता है।(द) द्विगुणन (Duplication) कभी-कभी किसी गुणसूत्र के किसी क्षेत्र की दो बार पुनरावृत्ति हो जाती है तब उन जीनों का द्विगुणन या डुप्लीकेशन माना जाता है। गुणसूत्र के ये अतिरिक्त टुकड़े द्विगुणित गुणसूत्र के किसी मध्य हिस्से में अथवा सिरों पर अथवा अन्य क्रोमोसोम से भी जुड़ सकते हैं।
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