मनुष्य के स्वार्थपूर्ण क्रियाकलापों के कारण होने वाले प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन से पृथ्वी की जैव विविधता का निरन्तर क्षय हो रहा है तथा जीवों व पादपों की अनेक प्रजातियाँ तेजी से विलुप्त हो रही हैं या संकटापन्न हैं।
संकटग्रस्त जातियों को बचाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं स्थानीय स्तर पर अनेक प्रयास किये जा रहे हैं-
(A) अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास (Internatinoal Efforts)- विश्व में जैवविविधता के निरन्तर ह्यस को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के आधीन वर्ष 1968 में एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था "विश्व प्रकृति संरक्षण 'संघ" (IUCN :International Union for Conservation of Nature) का गठन हुआ। इस संस्था द्वारा एक पुस्तक का प्रकाशन किया गया जिसे "रेड डाटा बुक" (Red Data Book) कहते हैं। इस पुस्तक में लुप्त हो रही जातियों, के आवास तथा वर्तमान में उनकी संख्या को सूचीबद्ध किया गया है। IUCN ने विश्व को जीव प्रजातियों के संरक्षण की दृष्टि से 5 वर्गों में विभाजित किया है |
1. विलुप्त प्रजातियां (Extinct Species) ऐसी जातियाँ जो अब विश्व में कहीं भी जीवित अवस्था में नहीं मिलती, विलुप्त प्रजातियाँ कहलाती हैं, उदाहरणार्थ-डोडो पक्षी, डायनासोर, रानिया पादप आदि।
2. संकटग्रस्त प्रजातियाँ (Endangered Species) ऐसी प्रजातियाँ जो विलुप्त होने के कगार पर हैं तथा जिनका संरक्षण नहीं किया गया तो शीघ्र विलुप्त हो जाएँगी, जैसे चीता, बाघ, बघेरा, जिन्गो बाइलोबा, सर्पगन्धा, गैण्डा आदि।
3. अतिसंवेदनशील प्रजातियाँ (Vulnerable Species)—ऐसी जातियाँ जिनकी संख्या तेजी से कम हो रही है तथा शीघ्र ही संकटग्रस्त की श्रेणी में आने की आशंका है जैसे—याक, नीलगिरी लंगूर, लाल पांडा, कोबरा, ब्लैक बग आदि।
4. दुर्लभ प्रजातियाँ (Rare Species) ऐसी जातियाँ जो प्रायः सीमित भौगोलिक क्षेत्र में रह गई हैं या जिनकी संख्या बहुत विरल है, जैसे- लाल भेड़िया, हैनान गिब्बन, ज्ञावान गैंडा।
(B) राष्ट्रीय प्रयास (National Efforts) केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 2002 में जैव विविधता एक्ट 2002 (Biodiversity Act 2002) बनाया गया जिसके तीन मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
1. जैव विविधता का संरक्षण।
2. जैव विविधता का ऐसा उपयोग जिससे यह लम्बे समय तक बनी रहे (sustainable use)|
3. देश के जैविक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का समान वितरण ताकि यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँच सके।
भारत में पर्यावरण, वन, जलवायु एवं जैव विविधता कानूनों को एक ही दायरे में लाने के उद्देश्य से दिनांक 2 जून 2010 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal) का गठन हुआ है। अब उक्त कानूनों के अन्तर्गत अपील उच्च न्यायालय में नहीं वरन् राष्ट्रीय हरित अधिकरण में दर्ज होगी जिससे इन विषयों से सम्बन्धित विवादों का निपटारा तेजी से होगा। राष्ट्रीय हरित अधिकरण का मुख्यालय भोपाल में बनाया गया है।