कुक्कुट पालन-प्राचीन समय से मुर्गे पालतू जन्तुओं के रूप में प्रयुक्त होते रहे हैं। बीसवीं शताब्दी में मनुष्य की स्वाद प्रवृत्ति तथा पौष्टिक भोजन की आवश्यकताओं ने मुर्गी पालन को एक महत्वपूर्ण कुटीर उद्योग का दर्जा दिया है। मुर्गी अपने अण्डे तथा माँस दोनों ही रूपों में भोजन प्रदान करती है। इसकी इसी उपयोगिता के कारण वैज्ञानिकों का ध्यान मुर्गों के प्रजनन, अंडज, उत्पत्ति, पालन-पोषण की कई नई तकनीकों के अनुसंधान की ओर आकर्षित हुआ।
कुक्कुट पालन में उपयोगी पक्षी- कुक्कुट पालन में प्रजातियों को कुक्कुट पालन हेतु उपयोग में लिया जाता है।
(i) मुर्गी प्रजातियाँ- भारत में घरेलू मुर्गी, गैलस डोमेस्टिकस को मुख्य रूप से पाला जाता है। दो प्रकार की मुर्गियों को कुक्कुट पालन हेतु उपयोग में लाया जाता है।
(अ) पारम्परिक देशी नस्लें-इनमें असील, ककरनाथ, ब्रह्मा, बसरा, पैगस, चिटगॉन आदि नस्लें हैं। इनमें से असली नस्ल की मुर्गों की लम्बाई के लिए गेम बर्ड की तरह पाला जाता है।
(ब) विदेशी नस्लें- इसमें अधिकतर यूरोपियन नस्लें शामिल हैं। विदेशी नस्लों में सफेद लैगहॉर्न, प्लाइमॉथ रॉक, रोडे आइलैण्ड रैड, न्यू हैम्पशायर आदि प्रमुख हैं।
(ii) बत्तख- ऐनास प्लेटीरिन्कोज से भी अण्डे व माँस प्राप्त होते हैं। भारत में कुल कुक्कुटों की जनसंख्या का 6% योगदान बत्तखों का है।
भारतीय वा सा भारतीय सिहले मेला--- नागेश्वरी प्रमुख हैं। जबकि मस्कोरी, पैकिन, आयलेसबरी कैम्पबैल __ आदि महत्वपूर्ण विदेशी नस्लें हैं।
प्रजनन के लिए मुर्गे-मुर्गियों का चुनाव
1. प्रजनन के लिए मुर्गे का चुनाव करना-मुर्गे का शरीर चमकीला, चौड़ा तथा गठीला होना चाहिए। उसकी आँखें चमकदार, चोंच छोटी,मुड़ी हुई, कॅलगी चमककदार लाल तथा बड़ी, पीठ चौड़ी, त्वचा पतली लचीली, पूँछ लम्बी व ऊपर की ओर मुड़ी होनी चाहिए।
2. प्रजनन के लिए मुर्गी का चयन- मुर्गी के शरीर का आकार बड़ा उसका सिर अच्छे आकार का तथा आँखें उभरी हुई। एक वर्ष से कम आयु की परिपक्व मुर्गी का भी चुनाव करना चाहिए। मुर्गी अच्छे स्वास्थ्य वाली, तेज बढ़ने वाली, अधिक अण्डे देने वाली होनी चाहिए। उससे चूजे भी अच्छे उत्पन्न होंगे।
प्रजनन विधि- कुक्कुट पालन में प्रजनन विधियाँ निम्न हैं-
(i) लाइन प्रजनन
(ii) बाह्य विनिमय
(iii) विनिमय
(iv) ग्रेडिंग
उष्मायन अंडजोत्पत्ति या स्फुटन–कुक्कुट के अण्डों की उष्मायन अवधि प्रत्येक जाति के कुक्कुट में भिन्न होती है। जैसे मुर्गी 21 दिन, टर्की, 28 दिन, वत्तख 28 दिन, जापानी बटेर 17-18 दिन होती है। ऊष्मायन के दौरान श्वसन, उत्सर्जन, पोषण एवं रक्षण (उल्व जरायु, अपरा पौषिक) आदि।
अण्डे सेना तथा चूजा पालन–अण्डे लेने को तथा इन्क्यूबेटर में से चूजा प्राप्त होने के बाद उसे पालने की क्रिया को कहते हैं। यह दो प्रकार से चूजों को पाला जाता है-
(i) प्राकृतिक ब्रूडिंग
(ii) कृत्रिम ब्रूडिंग
ब्रूडर गृह-इसमें चूजों को बाहर के जानवरों से बचाया जाता है। इसे हवा, आँधी, शीत लहर से भी बचाव किया जाता है।
कुक्कुट आहार-कुक्कुट आहार निम्न प्रकार का होता है-
(अ) कार्बोहाइड्रेट आहार-इसमें मक्का , गेहूँ, ओट, (जई) जौ, ज्वार, चावल, राव, आलू आदि कार्बोहाइड्रेट आहार हैं।
(ब) फैट फीट–सोयाबीन तेल, मूंगफली का तेल, बिनौले का तेल, मक्का का तेल, व्हीट जर्म आयल, पशुओं की चर्बी, जमाये गये तेल आदि का प्रयोग किया जाता है।
(स) प्रोटीन फीड्स- यह इसमें सबसे मूल्यवान भाग है। इसे दूध, मीट स्क्रेप, फिश मील Ca, P, Mn, लवण आदि शाक प्रोटीन फीड के अन्तर्गत आते हैं।
मुर्गियों के सामान्य रोग- इनमें सामान्य बीमारियाँ निम्न हैं-
(i) विषाणु जनित रोग
(ii) जीवाणु जनित रोग
(iii) कवक जनित रोग
यदि कोई भी संक्रामक रोग अधिक उम्र हो जाये तो रोगग्रस्त प्राणियों को मार देना चाहिए। इनके व्यवसायी को सामान्य रोग की जानकारी होना आवश्यक है।