प्रत्यावर्ती धारा जनित्र (A.C.Generator)-प्रत्यावर्ती धारा जनित्र एक ऐसी युक्ति है जो यांत्रिक ऊर्जा को प्रत्यावर्ती विधुत ऊर्जा में बदलती है।
संरचना . (Construction)-इसके मुख्य भाग निम्नलिखित हैं (i) क्षेत्र चुम्बक (ii) आर्मेचर (iii) वलय (iv) ब्रुश
(i) क्षेत्र चुम्बक (Field Magnet)—यह एक अति शक्तिशाली नाल चुम्बक होता है जिसके ध्रुवों के मध्य शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र में एक कुंडली को तीव्र गति से घुमाया जाता है।
(ii) आर्मेचर या कुंडली (Armature)-यह मुलायम लोहे के एक क्रोड पर लिपटी अत्यधिक संख्या में पृथक्कृत तारों की कुंडली है जिसे चुम्बकीय क्षेत्र में तीव्र गति से घुमाया जाता है। यह सामान्य रूप से 50 चक्कर प्रति सेकण्ड की दर से चक्कर लगाती है तो प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति कहलाती है।
(iii) सी वलय (Slip Rings)-कुंडली के सिरों A व D क्रमश: अलग-अलग पृथक्कृत धात्विक वलयों `C_(1)` व `C_(2)`) से जोड़ दिए जाते हैं। ये कुंडली के साथ-साथ घूमते हैं।
(iv) बुश (Brushes)-ये कार्बन या किसी धातु की पत्तियों से बने दो ब्रुश होते हैं। इनक एक सिरा सर्पी वलयों को स्पर्श करता है एवं दूसरे सिरों को बाह्य परिपथ से संबंधित कर दिया जाता है। ब्रुश कुंडली के साथ नहीं घूमते हैं।
कार्यविधि (Working)-माना कि कुंडली ABCD दक्षिणावर्त दिशा में घूम रही है, जिससे भुजा CD नीचे की ओर व भुजा AB ऊपर की ओर आ रही होती है। तब फ्लेमिंग के दाएँ हाथ के नियमानुसार इन भुजाओं में प्रेरित धारा की दिशा चित्रानुसार ABCD दिशा में होगी। अत: बाह्य परिपथ में B से धारा जाएगी तथा B से वापस आएगी। जब कुंडली अपनी ऊर्ध्वाधर स्थिति से गुजरेगी तब भुजा AB नीचे की ओर तथा CD ऊपर की ओर जाने लगेगी। इस कारण AB तथा CD में धारा की दिशाएँ पहले से विपरीत हो जाएँगी। इस प्रकार की धारा (Alternating Current) कहलाती है।
