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PHYSICS
किसी निकट - दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति ...

किसी निकट - दृष्टि दोष से पीड़ित व्यक्ति का दूर बिंदु नेत्र के सामने 80 cm दूरी पर है । इस दोष को संशोधित करने के लिए आवश्यक लेंस की प्रकृति तथा क्षमता क्या होगी ?

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निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये लेखक ने बताया है कि कितना अच्छा होता, यदि नाक होती ही नहीं। नाक के कारण मनुष्य चिंता में पड़कर परेशान रहता है। नाक बचाने के लिए मुकदमेबाजी में पड़ता है। ऋण लेकर बड़े-बड़े उत्सव करता है। दूसरों के मुकाबले में खड़ा होने के लिए महँगी किश्तों में टी.वी., फ्रिज और कूलर खरीदता है। बच्चों को महँगे स्कूलों में पढ़ाता है। कहने का अर्थ यह है कि वह हर छोटी-से-छोटी बात को नाक का प्रश्न बना लेता है। व्यापार करने वाले लोग पुलिस, आयकर अधिकारियों तथा अन्य अनेक लोगों को रिश्वत देते हैं। बुरा समय आने पर यही व्यक्ति दूसरों के समाने अपनी नाक को रगड़ने लगता है। लेखक ने नाक की अच्छाइयाँ भी बताई हैं। नाक का हमारे मुख पर बड़ा महत्त्व है। मुख पर सुंदर लंबी नाक शोभा बढ़ाती है। अतः कुछ लोग नाक न होने पर नाक लगाते हैं। अतः नाक हमारे लिए बहुत आवश्यक है। चाहे वह लंबी, छोटी, चपटी किसी भी प्रकार की हो। नाक के बिना मुनष्य का मुख ऐसा लगता है जैसे बिना छज्जे के मकान का सामने का हिस्सा। यदि नाक सुंदर है, तो बहुत अच्छी बात है। कवियों ने सुंदर नाक का वर्णन बहुत अधिक किया है। उन्होंने नायिकाओं के नाक की अनेकानेक उपमाएँ दी हैं। इन उपमानों में तोते की नाक की उपमा तो बड़ी विचित्र है।नाक हमारे शरीर का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंग है। यह बहुत ऊँचा अंग है। मुख पर किसी भी अंग की कमी या विकृति को छिपाया जा सकता है परंतु कटी नाक को किसी प्रकार से नहीं छिपाया जा सकता। नाक न रहने पर व्यक्ति कुरूपता का शिकार हो जाता है। "नाक के बिना मनुष्य का मुख ऐसा लगता है जैसे बिना छज्जे के मकान।" वाक्य में उपमेय तथा उपमान क्या हैं?

Two circles of radii 7 cm and 9 cm intersect at the points A and B. If AB = 10 cm and the distance between the centres of the circle is x cm, then the value of x is : त्रिज्या 7 सेमी और 9 सेमी वाले दो वृत्त एक दूसरे को बिंदु A और बिंदु B पर काटते हैं | यदि AB =10 सेमी है और वृत्तों के केंद्रों के बीच की दूरी x सेमी है, तो x का मान क्या होगा ?

प्राचीन भारत में शिक्षा को ज्ञान प्राप्ति का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता था। व्यक्ति के जीवन को सन्तुलित और श्रेष्ठ बनाने तथा एक नई दिशा प्रदान करने में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान था। सामाजिक बुराइयों को उसकी जड़ों से निर्मूल करने और त्रुटिपूर्ण जीवन में सुधार करने के लिए शिक्षा की नितान्त आवश्यकता थी। यह एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसके द्वारा सम्पूर्ण जीवन ही परिवर्तित किया जा सकता था। व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व का, विकास करने, वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करने और अपनी समस्याओं को दूर करने के लिए शिक्षा पर निर्भर होना पड़ता था। आधुनिक युग की भाँति प्राचीन भारत में भी मनुष्य के चरित्र का उत्थान शिक्षा से ही सम्भव था। सामाजिक उत्तरदायित्वों को निष्ठापूर्वक वहन करना प्रत्येक मानव का परम उद्देश्य माना जाता है। इसके लिए भी शिक्षित होना अनिवार्य है। जीवन की वास्तविकता को समझने में शिक्षा का उल्लेखनीय योगदान रहता है। भारतीय मनीषियों ने इस ओर अपना ध्यान केन्द्रित करके शिक्षा को समाज की आधारशिला के रूप में स्वीकार किया। विद्या का स्थान किसी भी वस्तु से बहुत ऊँचा बताया गया। प्रखर बुद्धि एवं सही विवेक के लिए शिक्षा की उपयोगिता को स्वीकार किया गया। यह माना गया कि शिक्षा ही मनुष्य को व्यावहारिक कर्तव्यों का पाठ पढ़ाने और सफल नागरिक बनाने में सक्षम है। इसके माध्यम से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अर्थात् सर्वांगीण विकास सम्भव है। शिक्षा ने ही प्राचीन संस्कृति को संरक्षण दिया और इसके प्रसार में मदद की। विद्या का आरम्भ 'उपनयन संस्कार' द्वारा होता था। उपनयन संस्कार के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए मनुस्मृति में उल्लेख मिलता है कि गर्भाधान संस्कार द्वारा तो व्यक्ति का शरीर उत्पन्न होता है पर उपनयन संस्कार द्वारा उसका आध्यात्मिक जन्म होता है। प्राचीन काल में बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आचार्य के पास भेजा जाता था। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, जो ब्रहाचर्य ग्रहण करता है। वह लम्बी अवधि की यज्ञावधि ग्रहण करता है। छान्दोग्योपनिषद् में उल्लेख मिलता है कि आरुणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्मचारी रूप से वेदाध्ययन के लिए गुरु के पास जाने को प्रेरित किया था। आचार्य के पास रहते हुए ब्रह्मचारी को तप और साधना का जीवन बिताते हुए विद्याध्ययन में तल्लीन रहना पड़ता था। इस अवस्था में बालक जो ज्ञानार्जन करता था उसका लाभ उसको जीवन भर मिलता था। गुरु गृह में निवास करते हुए विद्यार्थी समाज के निकट सम्पर्क में आता था। गुरु के लिए समिधा, जल का लाना तथा गृह-कार्य करना उसका कर्तव्य माना जाता था। गृहस्थ धर्म की शिक्षा के साथ-साथ वह श्रम और सेवा का पाठ पढ़ता था। शिक्षा केवल सैद्धान्तिक और पुस्तकीय न होकर जीवन की वास्तविकताओं के निकट होती थी। प्रस्तुत गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से कौन-सा हो सकता है?