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PHYSICS
एक रेलगाड़ी विरामावस्था से सीधी पटरी पर ...

एक रेलगाड़ी विरामावस्था से सीधी पटरी पर चलना प्रारम्भ करती और 5 मिनट में 72 km/h का वेग प्राप्त क्र लेती है । , मान ले की त्वरण एकसमान है , गणना करे (क ) त्वरण , (ख ) इस वेग को प्राप्त करने के लिए रेलगाड़ी द्वारा तय की गयी दूरी।

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The distance between two railway stations is 1176 km. To cover this distance, an express train 5 hours less than a passenger train while the average speed of the passenger train is 70 km/h less than that of the express train. The time taken by the passenger train to complete the travel is: दो रेलवे स्टेशनों के बीच की दूरी 1176 किमी है। इस दूरी को तय करने के लिए, एक एक्सप्रेस ट्रेन यात्री ट्रेन की तुलना में 5 घंटे कम लेती है जबकि यात्री ट्रेन की औसत चाल एक्सप्रेस ट्रेन की औसत चाल की तुलना में 70 किमी/घंटा कम है। यात्रा को पूर्ण करने में यात्री ट्रेन द्वारा लिया गया समय कितना है ?

A train travels the distance between stations P and Q at a speed of 126 km/h, while in the opposite direction it comes back at 90 km/h. Another train travels the same distance at the average speed of the first train. The time taken by the second train to travel 525 km is: एक ट्रेन 126 किमी/घंटा की चाल से स्टेशनों P और Q के बीच की दूरी तय करती है, जबकि विपरीत दिशा में यह 90 किमी/घंटा की चाल से वापस आती है। दूसरी ट्रेन पहले ट्रेन की औसत चाल से समान दूरी तय करती है। 525 किमी की यात्रा के लिए दूसरी ट्रेन द्वारा लिया गया समय है:

If a train runs at 60 Km/h, it reaches its destination 15 late. But, if it runs at 80 Km/h, it is late by 7 minutes only. The right time for the train to cover its journey is: यदि एक ट्रेन 60 किमी/घंटा की चाल से चलती है तो यह अपने गंतव्य स्थल पर 15 मिनट देर से पहुँचती है | लेकिन, यदि यह 80 किमी/घंटा की चाल से चलती है, तो इसे केवल 7 मिनट की देरी होती है | इस यात्रा को पूर्ण करने में ट्रेन को लगने वाला सही समय ज्ञात करें |

हमारा जीवन जिन मानवीय सिद्धांतों, अनुभवों और सांस्कृतिक संस्कारों के संबल से समस्त सृष्टि के लिए महत्त्वपूर्ण बना है, परोपकार की भावना उन्हीं में एक है। मानव को दूसरे मानव के प्रति वैसा ही संवेदनात्मक उत्तरदायित्व निभाना चाहिए, जैसे वह स्वयं के प्रति निभाता है। जीवन को केवल परोपकार, पर सेवा और निःस्वार्थ प्रेम के लिए ही वास्तविक समझना चाहिए क्योंकि नश्वर शरीर जब नष्ट हो जाएगा तो उसके बाद हमारा कुछ भी इस दुनिया के जीवों की स्मृति में नही रहेगा। हम जग जीवों की स्मृति में सदा-सदा के लिए तभी बने रह सकते हैं, जब हम अपने नश्वर शरीर को वैचारिक, बौद्धिक और आत्मिक चेतना से पूर्ण कर निःस्वार्थ भाव से स्वयं को जीव सेवा में समर्पित करेंगे। हमें स्थिरता से और शांतिपूर्वक यह विचार करते रहना चाहिए कि हमारे जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य और एकमात्र लक्ष्य हमारे द्वारा किया जाने वाला त्याग है। त्याग योग्य व्यक्तित्व प्राप्त करने के लिए गहन तप की आवश्यकता है। त्याग का भाव किसी मनुष्य में साधारण होते हुए नही जन्म लेता। इसके लिए मनुष्य को जीवन-जगत और इसके जीवों के संबंध में असाधारण वैचारिक रचनात्मकता अपनाकर निरंतर योग, ध्यान, तप व साधना करनी होगी। उसे इस स्थिति से विचरते हुए विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभवों से लैस होना होगा। आवश्यकता होने पर उसे जीवों की वास्तविक सेवा करनी होगी। जब ऐसी विशेष मानवीय परिस्थितियों उत्पन्न होंगी, तब ही मानव में त्याग भाव आकार ग्रहण करेगा। त्याग के योग्य व्यक्तित्व प्राप्त करने के लिए आवश्यक है

हमारा जीवन जिन मानवीय सिद्धांतों, अनुभवों और सांस्कृतिक संस्कारों के संबल से समस्त सृष्टि के लिए महत्वपूर्ण बना है, परोपकार की भावना उन्हीं में एक है। मानव को दूसरे मानव के प्रति वैसा ही संवेदनात्मक उत्तरदायित्व निभाना चाहिए, जैसे वह स्वयं के प्रति निभाता है। जीवन को केवल परोपकार, पर सेवा और निःस्वार्थ प्रेम के लिए ही वास्तविक समझना चाहिए। क्योंकि नश्वर शरीर जब नष्ट हो जाएगा तो उसके बाद हमारा कुछ भी इस दुनिया के जीवों की स्मृति में नहीं रहेगा। हम जग जीवों की स्मृति में सदा-सदा के लिए तभी बने रह सकते हैं, जब हम अपने नश्वर शरीर को वैचारिक, बौद्धिक और आत्मिक चेतना से पूर्ण कर निःस्वार्थ भाव से स्वयं को जीव सेवा में समर्पित करेंगे। हमें स्थिरता से और शांतिपूर्वक यह विचार करते रहना चाहिए कि हमारे जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य और एकमात्र लक्ष्य हमारे द्वारा किया जाने वाला त्याग है। त्याग योग्य व्यक्तित्व प्राप्त करने के लिए गहन तप की आवश्यकता है। त्याग का भाव किसी मनुष्य में साधारण होते हुए नहीं जन्म लेता। इसके लिए मनुष्य को - जीवनजगत और इसके जीवों के संबंध में असाधारण वैचारिक रचनात्मकता अपनाकर निरंतर योग, ध्यान, तप व साधना करनी होगी। उसे इस स्थिति से विचरते हुए विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभवों . से लैस होना होगा। आवश्यकता होने पर उसे जीवों की वास्तविक । सेवा करनी होगी। जब ऐसी विशेष मानवीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी, तब ही मानव में त्यागः भाव आकार ग्रहण करेगा। त्याग के योग्य व्यक्तित्व प्राप्त करने के लिए आवश्यक है |

A train leaves P at 9 am with speed of 30 km/h. Another train leaves Q at 11 am with speed of 45 km/h. The trains are travelling towards each other on parallel tracks. Distance between P and Q is 300 km. When they meet, what is the ratio of the distances covered by them? एक ट्रेन सुबह 9 बजे 30 km/h की गति से P से निकलती है। एक अन्य ट्रेन सुबह 11 बजे 45 km/h की गति से Q से निकलती है। ट्रेनें समानांतर पटरियों पर एक-दूसरे की ओर जा रही हैं। P और Q के बीच की दूरी 300 km है। वे कब मिलेंगीं, एवं उनके द्वारा तय की गई दूरियों का अनुपात कितना होगा?

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