किसी परीक्षण जिसमें x पर आधारित 15 प्रेक्षण है में निम्न परिणाम उपलब्ध है, `Sigmax^(2)=2830, Sigmax=170`| जाँच करने पर प्रेक्षण 20 अशुद्ध प्राप्त हुआ तथा इसको '30 ' से प्रतिस्थापित कर दिया गया । शुद्ध विचलन होगा -
किसी परीक्षण जिसमें x पर आधारित 15 प्रेक्षण है में निम्न परिणाम उपलब्ध है, `Sigmax^(2)=2830, Sigmax=170`| जाँच करने पर प्रेक्षण 20 अशुद्ध प्राप्त हुआ तथा इसको '30 ' से प्रतिस्थापित कर दिया गया । शुद्ध विचलन होगा -
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The full marks for a paper is 300. The break-up of the marks into theory (X), practical (Y) and project (Z), which are the three components of evaluation is 6:5:4. In order to pass one has to score at least 40%, 50% and 50% respectively in X,Y,Z and 60% in aggregate.The marks scored by four students A,B,C and D are shown in the given Bar Graph. किसी विषय का पूर्णाक 300 है | मूल्यांकन के तीन घटकों - थ्योरी (X), प्रेक्टिकल ( Y) और प्रोजेक्ट (Z) में अंकों को 6 : 5: 4 के अनुपात में विभाजित किया जाता है | पास करने के लिए, एक छात्र को X, Y, Z में क्रमशः 40%, 50% और 50% प्राप्त करना तथा समग्र रूप से 60% प्राप्त करना अनिवार्य है | चार छात्रों A, B,C और D के द्वारा प्राप्त किये गए अंकों को दिए गए दंड आरेख में प्रस्तुत किया गया है | Who among the students could not pass? निम्न में से कौन सा छात्र पास नहीं कर सका ?
भारतीय साहित्य भारतीय संस्कृति के आधार पर विकसित हुआ है। इस संस्कृति में भारतीयता के बीज समाहित हैं। जब कभी-भी भारतीय अपनी पहचान का व्याख्यान करने को उत्सुक होता है, उसे अपनी जड़ से जोड़कर देखना चाहता है। यह केवल भारत व भारतीय के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि किसी भी देश के प्रान्त से जुड़ा हुआ मसला है। अपने को अन्य से 5 जोड़कर तर्क दिए जाते हैं। उसे अपनी जड़ से जोड़कर ही देखते हैं। वर्तमान में भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बीच उपजी हुई विषय वस्तु को ही आधार बनाकर अपनी पहचान को जोड़ते हैं, जिसके कारण दक्षिण भारतीय या उत्तर भारतीय सभी भारतीय संस्कृति को टूटी कड़ियों से जोड़कर अपने आपको अलग स्थापित करते हैं। इसका परिणाम भारतीय स्तर पर विखण्डन के रूप में भी देखने को मिलता है। इस परिणाम के तहत भाषा व संस्कृति के आधार पर विभिन्न प्रान्तों का निर्माण भी सम्भव हो गया। यदि यही विखण्डित समाज भारतीय संस्कृति के मूल से जोड़कर अपने।को देखता होता तो भाषायी एकता भी बनती और क्षेत्रवाद का काला धुआँ, जो भारतीय आकाश पर मण्डरा रहा है, उसकी उत्पत्ति ही सम्भव नहीं हो पाती। इस सन्दर्भ में भारतीयता व उसके समीप उपजे साहित्य को सीमाओं में जाँचना जरूरी है। इसकी प्रकृति की खोज और इसके परिणामों की व्याख्या भारतीय साहित्य व भारतीयता के सन्दर्भ में खोजनी होंगी। भारतीयता के सन्दर्भ में साहित्य और समाज के सम्बन्धों को समझना आवश्यक है। साहित्य का जन्म समाज में ही सम्भव हो सकता है, इसलिए मानवीय संवेदनाओं को हम उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम से समझ सकते हैं। यह अभिव्यक्ति समाज और काल में अलग-अलग रूपों में प्रकट हुई है। यदि हम पाषाण काल के खण्डों और उसके वन में ही रहने वालों की स्थिति को देखें, तो उनके विचार शब्दों में नहीं, बल्कि रेखाचित्रों में देखने को मिलते हैं। कई गुफाओं में इन समाजों की अभिव्यक्ति को पत्थर पर खुदे निशानों में देख सकते हैं। ये निशान उनके जन-जीवन में घटने वाली घटनाओं को प्रदर्शित करते नजर आते हैं। उनमें शिकार करते आदिमानव को देख सकते हैं, जो जीवन-यापन के साधन हैं। उन चित्रों में हल चलाने वाले किसानों की अभिव्यक्ति नहीं मिलती। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह समाज वनाचरण व्यवस्था में ही सिमटी या उनका जीवन-यापन शिकार पर ही केन्द्रित या सभ्यता के विकास की गाथा उसके जीवन में नहीं गाई जा रही थी, लेकिन समय की पहली धारा में जो प्रभाव देखे जाते हैं, वह सभ्यता के रूप में गिरे पड़े टूटे-फूटे प्राप्त ऐतिहासिक खोज में देख सकते हैं। भारतीय साहित्य किसके आधार पर विकसित हुआ है?
भारतीय साहित्य भारतीय संस्कृति के आधार पर विकसित हुआ है। इस संस्कृति में भारतीयता के बीज समाहित हैं। जब कभी-भी भारतीय अपनी पहचान का व्याख्यान करने को उत्सुक होता है, उसे अपनी जड़ से जोड़कर देखना चाहता है। यह केवल भारत व भारतीय के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि किसी भी देश के प्रान्त से जुड़ा हुआ मसला है। अपने को अन्य से 5 जोड़कर तर्क दिए जाते हैं। उसे अपनी जड़ से जोड़कर ही देखते हैं। वर्तमान में भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बीच उपजी हुई विषय वस्तु को ही आधार बनाकर अपनी पहचान को जोड़ते हैं, जिसके कारण दक्षिण भारतीय या उत्तर भारतीय सभी भारतीय संस्कृति को टूटी कड़ियों से जोड़कर अपने आपको अलग स्थापित करते हैं। इसका परिणाम भारतीय स्तर पर विखण्डन के रूप में भी देखने को मिलता है। इस परिणाम के तहत भाषा व संस्कृति के आधार पर विभिन्न प्रान्तों का निर्माण भी सम्भव हो गया। यदि यही विखण्डित समाज भारतीय संस्कृति के मूल से जोड़कर अपने।को देखता होता तो भाषायी एकता भी बनती और क्षेत्रवाद का काला धुआँ, जो भारतीय आकाश पर मण्डरा रहा है, उसकी उत्पत्ति ही सम्भव नहीं हो पाती। इस सन्दर्भ में भारतीयता व उसके समीप उपजे साहित्य को सीमाओं में जाँचना जरूरी है। इसकी प्रकृति की खोज और इसके परिणामों की व्याख्या भारतीय साहित्य व भारतीयता के सन्दर्भ में खोजनी होंगी। भारतीयता के सन्दर्भ में साहित्य और समाज के सम्बन्धों को समझना आवश्यक है। साहित्य का जन्म समाज में ही सम्भव हो सकता है, इसलिए मानवीय संवेदनाओं को हम उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम से समझ सकते हैं। यह अभिव्यक्ति समाज और काल में अलग-अलग रूपों में प्रकट हुई है। यदि हम पाषाण काल के खण्डों और उसके वन में ही रहने वालों की स्थिति को देखें, तो उनके विचार शब्दों में नहीं, बल्कि रेखाचित्रों में देखने को मिलते हैं। कई गुफाओं में इन समाजों की अभिव्यक्ति को पत्थर पर खुदे निशानों में देख सकते हैं। ये निशान उनके जन-जीवन में घटने वाली घटनाओं को प्रदर्शित करते नजर आते हैं। उनमें शिकार करते आदिमानव को देख सकते हैं, जो जीवन-यापन के साधन हैं। उन चित्रों में हल चलाने वाले किसानों की अभिव्यक्ति नहीं मिलती। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह समाज वनाचरण व्यवस्था में ही सिमटी या उनका जीवन-यापन शिकार पर ही केन्द्रित या सभ्यता के विकास की गाथा उसके जीवन में नहीं गाई जा रही थी, लेकिन समय की पहली धारा में जो प्रभाव देखे जाते हैं, वह सभ्यता के रूप में गिरे पड़े टूटे-फूटे प्राप्त ऐतिहासिक खोज में देख सकते हैं। साहित्य का जन्म किससे सम्भव है?
निर्देशः गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। स्थूल एवं बाह्य पदार्थ सूक्ष्म एवं मानसिक पदार्थों एवं भावों की अपेक्षा अधिक महत्त्व के विषय नहीं हैं। जो व्यक्ति रचनात्मक कार्य करने में समर्थ है, उसे भौतिक स्कूल लाभ अथवा प्रलोभन न तो लुभाते हैं और न ही प्रोत्साहित करते हैं। विश्व में विचारक दस में से एक ही व्यक्ति होता है। उसमें भौतिक महत्त्वकांक्षाएँ अत्यल्प होती हैं। 'पूँजी' का रचयिता कार्ल मार्क्स जीवनभर निर्धनता से जूझता रहा। राज्याधिकारियों ने सुकरात को मरवा डाला, पर वह जीवन के अन्तिम क्षणों में भी शांत था, क्योंकि वह अपने जीवन के लक्ष्य का भली-भांति निर्वाह कर चुका था। यदि उसे पुरस्कृत किया जाता, प्रतिष्ठा के अंबारों से लाद दिया जाता, परन्तु अपना काम न करने दिया जाता तो निश्चय ही वह अनुभव करता कि उसे कठोर रूप में दंडित किया गया है। ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब हमें बाहरी सुख-सुविधाएँ आकर्षित करती हैं, वे अच्छे जीवन के लिए अनिवार्य लगने लगती हैं किन्तु महत्त्वपूर्ण यह है कि क्या हमने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर दिया? यदि इसका उत्तर 'हाँ' है तो बाह्य वस्तुओं का अभाव नहीं खलेगा और यदि 'नहीं' है तो हमें अपने को भटकने से बचाना होगा और लक्ष्य की ओर बढ़ना होगा। "जो व्यक्ति रचनात्मक कार्य करने में समर्थ हैं..." वाक्य में रेखांकित शब्द के स्थान पर कौन-सा शब्द प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है ?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। स्थूल एवं बाह्य पदार्थ सूक्ष्म एवं मानसिक पदार्थों एवं भावों की अपेक्षा अधिक महत्त्व के विषय नहीं हैं। जो व्यक्ति रचनात्मक कार्य करने में समर्थ है, उसे भौतिक स्कूली लाभ अथवा प्रलोभन न तो लुभाते हैं और न ही प्रोत्साहित करते हैं। विश्व में विचारक दस में से एक ही व्यक्ति होता है। उसमें भौतिक महत्त्वकांक्षाएँ अत्यल्प होती हैं। 'पूँजी' का रचयिता कार्ल मार्क्स जीवनभर निर्धनता से जूझता रहा। राज्याधिकारियों ने सुकरात को मरवा डाला, पर वह जीवन के अन्तिम क्षणों में भी शांत था, क्योंकि वह अपने जीवन के लक्ष्य का भली-भांति निर्वाह कर चुका था। यदि उसे पुरस्कृत किया जाता, प्रतिष्ठा के अंबारों से लाद दिया जाता, परन्तु अपना काम न करने दिया जाता तो निश्चय ही वह अनुभव करता कि उसे कठोर रूप में दंडित किया गया है। ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब हमें बाहरी सुख-सुविधाएँ आकर्षित करती हैं, वे अच्छे जीवन के लिए अनिवार्य लगने लगती हैं किन्तु महत्त्वपूर्ण यह है कि क्या हमने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर दिया? यदि इसका उत्तर 'हाँ' है तो बाह्य वस्तुओं का अभाव नहीं खलेगा और यदि नहीं है तो हमें अपने को भटकने से बचाना होगा और लक्ष्य की ओर बढ़ना होगा। ''जो व्यक्ति रचनात्मक कार्य करने में समर्थ हैं..." वाक्य में रेखांकित शब्द के स्थान पर कौन-सा शब्द प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है?
स्थूल एवं बाह्य पदार्थ सूक्ष्म एवं मानसिक पदार्थों एवं भावों की अपेक्षा अधिक महत्त्व के विषय नहीं हैं। जो व्यक्ति रचनात्मक कार्य । करने में समर्थ है, उसे भौतिक स्कूल लाभ अथवा प्रलोभन न तो लुभाते हैं और न ही प्रोत्साहित करते हैं। विश्व में विचारक दस में से एक ही व्यक्ति होता है। उसमें भौतिक महत्त्वकांक्षाएँ अत्यल्प होती हैं। 'पूँजी' का रचयिता कार्लर मार्क्स जीवनभर निर्धनता से जूझता रहा। राज्याधिकारियों ने सुकरात । को मरवा डाला, पर वह जीवन के अन्तिम क्षणों में भी शात था, क्योंकि वह अपने जीवन के लक्ष्य का भली-भांति निर्वाह कर चुका था। यदि उसे पुरस्कृत किया जाता, प्रतिष्ठा के अंबारों से लाद दिया जाता, परन्तु अपना काम न करने दिया जाता तो निश्चय ही वह अनुभव करता कि उसे कठोर रूप में दंडित किया गया है। ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब हमें बाहरी सुख-सुविधाएँ आकर्षित करती हैं, वे अच्छे जीवन के लिए अनिवार्य लगने लगती हैं किन्तु महत्त्वपूर्ण यह है कि क्या हमने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर दिया? यदि इसका उत्तर 'हाँ' है तो बाह्य वस्तुओं का अभाव नहीं खलेगा और यदि 'नहीं' है तो हमें अपने को भटकने से बचाना होगा और लक्ष्य की ओर बढ़ना होगा "जो व्यक्ति रचनात्मक कार्य करने में समर्थ हैं वाक्य में रेखांकित शब्द के स्थान पर कौन-सा शब्द प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है?
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