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मेण्डल के आनुवंशिकता के नियमों को समझाइय...

मेण्डल के आनुवंशिकता के नियमों को समझाइये।

लिखित उत्तर

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मेण्डल ने मटर पर कार्य करते हुए वंशागति के सिद्धांतों को बताया , जिन्हें मेण्डल के आनुवंशिकता के नियम के नाम से जाना जाता है।
1. प्रभाविता का नियम - जब दो शुद्ध गुणों ( लम्बा व बौना ) का संकरण होता है तो प्रथम पीढ़ी में केवल प्रभावी गुण ( लम्बा ) प्रकट होता है व अप्रभावी गुण ( बौना ) अभिव्यक्त नहीं होता है। इसे प्रभाविता का नियम कहते है। लंबापन प्रभावी गुण है एवं बौनापन अप्रभावी गुण है। देखिये नीचे चित्र में।

`F_(1)` पीढ़ी में सभी पौधे (100%) लम्बे (Tt) प्राप्त होते है।
2. पृथक्करण का नियम - इस नियम के अनुसार जब दो विपरीत लक्षणों वाले शुद्ध नस्ल के एक ही जाति के दो पौधों या जनकों के बीच संकरण कराया जाता है , तो उनकी `F_(1)` पीढ़ी में संकर पौधे प्राप्त होते है और सिर्फ प्रभावी लक्षण को ही प्रकट करते है। किन्तु इनकी दूसरी पीढ़ी `(F_(2))`के पौधों में परस्पर विपरीत लक्षणों का एक निश्चित अनुपात `(1 : 2 : 1)` में पृथक्करण हो जाता है और युग्मक निर्माण के समय गुण पृथक हो जाते है और युग्मकों की शुद्धता बनी रहती है , इसलिए इसे युग्मकों की शुद्धता का नियम भी कहते है। यह नियम एक संकर संकरण के परिणामों पर आधारित है।
इस शुद्धता के नियम को निम्न प्रकार से समझ सकते है। जब दो पौधों को क्रॉस कराया गया `(T T xx t t ) `तब `F_(1)` के लम्बे पौधों में दोनों के जीन उपस्थित थे , परन्तु `F_(2)` में यह जीन या लक्षण पृथक होकर पुनः लम्बे व बौने पौधे बनाते है। देखिये नीचे चित्र में।

3. स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम - इस नियम के अनुसार जब दो या दो से अधिक जोड़ी विपरीत लक्षणों वाले पौधे में क्रॉस ( संकरण ) करवाया जाता है तो समस्त लक्षणों की वंशागति स्वतंत्र रूप से होती है अर्थात एक लक्षण की वंशागति पर दूसरे लक्षण की उपस्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः इसे स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम कहते है।
जब संयुग्मजी पीले गोलाकार (YYR R) बीजों वाले पौधों को संयुग्मजी हरे झुर्रीदार (yyrr) बीजों वाले पौधे से संकरण कराया जाता है तो `F_(1)` पीढ़ी में विषमयुग्मजी पीले गोलाकार (YyRr) लक्षण प्रकट होते है। झुर्रीदार व हरा लक्षण अप्रभावी रहता है।
`F_(1)` पीढ़ी में परस्पर स्वपरागण करने पर `F_(2)` पीढ़ी प्राप्त होती है जिसमें फीनोटाइप ( लक्षण प्ररूप ) `9: 3 : 3 : 1` के अनुपात में प्राप्त होता है। इसे द्विसंकर क्रॉस भी कहते है। इन्हें इस प्रकार से लिखा जा सकता -
9 पीले - गोल : 3 पीले झुर्रीदार : 3 हरे - गोल : 1 हरा - झुर्रीदार
जीनी प्ररूपी अनुपात - `1 : 2 : 2 : 4 : 1 : 2 : 1 : 2 : 1`
लक्षण प्ररूपी अनुपात - `9 : 3 : 3 : 1`
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  1. लक्षणप्ररूप व जीनप्ररूप में अंतर लिखिये।

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  2. द्विसंकर संकरण परीक्षण में फीनोटाइप का अनुपात बताइये |

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  3. मेण्डल की सफलता के कारण लिखिये।

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  4. मेण्डल ने अपने प्रयोग के लिए मटर के पौधे को ही क्यों चुना ?

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  5. मेण्डल का संक्षिप्त जीवन परिचय लिखिये।

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  6. मेण्डल के प्रभावित नियम को सउदाहरण समझाइये।

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  7. मेण्डल के वंशागति के नियमों के कोई दो महत्व लिखिए।

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  8. मेण्डल के आनुवंशिकता नियमों का महत्व लिखिये।

    Text Solution

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  9. मेण्डल के पृथक्करण के नियम को उदाहरण सहित समझाइये।

    Text Solution

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  10. मेण्डलवाद क्या है ? स्वतंत्र अपव्यूहन नियम क्या है ?

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  11. मेण्डल के आनुवंशिकता के नियमों को समझाइये।

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