अपशिष्ट-किसी भी प्रक्रम के अन्त में बनने वाले अनुपयोगी पदार्थ या उत्पाद अपशिष्ट कहलाते हैं।
अपशिष्ट के प्रकार-अपशिष्टों को दो श्रेणियों में विभक्त किया गया हैजैव निम्नीकरणीय व अजैव निम्नीकरणीय।
(i) जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट-वे अपशिष्ट पदार्थ जिनका जैविक कारकों के द्वारा अपघटन हो जाता है, जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट कहलाते हैं। जैसे-घरेलू जैविक कचरा, कृषि व चिकित्सकीय जैविक अपशिष्ट, फसलों के बचे भाग, रुई, पट्टियाँ, मांस के टुकड़े आदि।
(ii) अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट-वे अपशिष्ट पदार्थ जिनका जैविक कारकों के द्वारा अपघटन नहीं हो पाता है, वे अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट कहलाते हैं। जैसे-प्लास्टिक की बोतलें, पॉलिथीन थैलियाँ, काँच, सुइयाँ, धातु के टुकड़े आदि।
अपशिष्टों के दुष्प्रभाव-अपशिष्ट आज भारत की ही नहीं बल्कि वैश्विक समस्या है। प्रतिदिन नगरों, छोटे नगरों व गाँवों से अधिक मात्रा में कूड़ा निकलता है। यह कूड़ा बीमारियाँ फैलाता है तथा नगरों के सौन्दर्य को बिगाड़ता है। दहन क्रियाओं से `CO_2, CO, SO_2 ` गैसें निकलती हैं जिससे वायु में • प्रदूषण उत्पन्न होता है। कपड़ा उद्योग, रासायनिक उद्योग, गन्ना एवं शक्कर उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट भी वायु व जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं । कृषि कार्यों में निरन्तर भारी मात्रा में कीटनाशकों व उर्वरकों का उपयोग जल, वायु व भूमि का प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। नाभिकीय विस्फोटक एवं आण्विक हथियारों के परीक्षण से रेडियोधर्मी पदार्थ उत्पन्न होकर प्रदूषण करते हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआँ तथा मार्बल व पत्थर कटिंग मशीनों से निकलने वाले सूक्ष्म कण वायु प्रदूषण करते हैं।
वायुमण्डल में `CO_2` की वृद्धि के कारण तापमान में वृद्धि होती है जिससे ग्रीन हाउस प्रभाव हो रहा है। CO शरीर में जाकर रुधिर हीमोग्लोबिन के साथ संयुक्त होकर एक यौगिक कार्बोक्सी हीमोग्लोबिन का निर्माण करती है जिससे शरीर में `O_2` की कमी से हाइपाक्सिया रोग हो जाता है । `SO_4` के कारण आँखों व श्वसन तंत्र में जलन उत्पन्न होती है। यही आगे जाकर `H_2SO_4` में परिवर्तित होकर इमारतों व स्मारकों का क्षय, पादपों में ऊतक क्षय व हरिमाहीनता उत्पन्न करता है।
`H_2S` की उपस्थिति से शरीर में विकार, उल्टी, सिरदर्द व मूर्छा आ जाती है। NO की सान्द्रता से श्वसन सम्बन्धी रोग, `NO_2` की मात्रा से फेफड़ों के रोग हो जाते हैं। वायुमण्डल में जस्ता, सीसा व पारे के कण विद्यमान हैं जिनका मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव होता है। सीसे की उपस्थिति के कारण RBC नष्ट हो जाती है। CFC का अधिक उपयोग अधिक नुकसानदायक है।
प्रदूषित जल से अनेक प्रकार के रोग हैजा, टाइफाइड, पेचिस, वाइरस से यकृतशोध, पीलिया, अमीबीय अतिसार, दाँतों व हड्डियों के रोग हो जाते हैं। प्रदूषित जल में `O_2` की मात्रा कम होने से जलीय जन्तु प्रभावित होते हैं । कृषि में उर्वरकों, रसायनों तथा कीटनाशकों, खानों, खाद्यान्नों द्वारा निकले ठोस कचरे, कागज व चीनी मिलों के अपशिष्ट, प्लास्टिक आदि अधिक हानि पहुँचाते हैं। अधिक शोर से कान का पर्दा फट जाता है, कार्यकीय दुष्प्रभाव, सरदर्द, रक्तचाप व हृदयगति बढ़ना, मिचली व चिड़चिड़ापन हो जाता है। रेडियोधर्मी अपशिष्टों का अत्यधिक हानिकारक प्रभाव होता है।