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नीचे दी हुई सारणी भारत के विभिन्न राज्यो...

नीचे दी हुई सारणी भारत के विभिन्न राज्यों एवं संघीय क्षेत्रों के ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक विद्यालयों में महिला शिक्षकों के प्रतिशत बंटन को दर्शाती है। इन अनुच्छेद में चर्चित तीनों विधियों
से महिला शिक्षकों का माध्य प्रतिशत ज्ञात कीजिए।

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The table given below shows the number of applicants who have applied for exam at various centres as percentage of total number of applicants. The table also shows the number online applicants and absent applicants as a percentage of total applicants of each centre. Total number of applicants is 1200000. नीचे दी गई तालिका में विभिन्न परीक्षा केन्द्रों में परीक्षा का नामांकन भरने वाले अभ्यर्थियों को संख्या को कुल अभ्यर्थियों की संख्या के प्रतिशत के रूप में दर्शाया गया है। यह तालिका प्रत्येक परीक्षा केन्द्र के ऑनलाइन अभ्यर्थियों तथा अनुपस्थित अभ्यर्थियों की संख्या को कुल अभ्यर्थियों की संख्या के प्रतिशत के रूप में दर्शाती है। अभ्यर्थियों की कुल संख्या 1200000 है। If A equals to 15% of total applicants who are present at exam centre F and B equals to present applicants at exam centre K, then A is what percent of B? यदि A परीक्षा केन्द्र F पर उपस्थित अभ्यर्थियों की कुल संख्या के 15% के बराबर है तथा B परीक्षा केन्द्र K पर उपस्थित अभ्यर्थियों के बराबर है, तो A, B का कितना प्रतिशत है?

आधुनिक शिक्षण संस्थाएँ ही नहीं, बल्कि परिवार एवं समाज के अन्य सदस्य। भी अपने कार्य एवं व्यवहार से मनुष्य के शिक्षण में सहायक होते हैं। किसी भी क्षेत्र विशेष के लोगों पर उसके क्षेत्र का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह प्रभाव भाषा ही नहीं व्यवहार में भी दिखाई पड़ता है। इस तरह की शिक्षा को अनौपचारिक शिक्षण के अन्तर्गत रखा जाता है। इस तरह सामान्य रूप से शिक्षा की दो प्रणालियाँ होती हैं-औपचारिक शिक्षा एवं अनौपचारिक शिक्षा। मुक्त विद्यालय एवं विश्वविद्यालय अनौपचारिक शिक्षा के ही उदाहरण हैं। इनके अलावा परिवार के सदस्य भी बालकों की शिक्षा में प्रत्यक्ष रूप से अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हैं। समुदाय के अन्य सदस्यों की भी इसमें सहभागिता होती है। बालक अपनी परम्परा एवं अपने रीतिरिवाजों को समाज के अन्य सदस्यों द्वारा ही सीखता है। बालकों पर उसके परिवेश उसके साथियों का भी प्रभाव पड़ता है। गलत संगति में बालकों में गलत आदतों का विकास अथवा आपराधिक प्रवृत्तियों में लिप्त हो जाना इसका उदाहरण है। औपचारिक शिक्षा में शिक्षण का स्थान सुनिश्चित होता है, जबकि अनौपचारिक में ऐसा नहीं। होता। औपचारिक शिक्षा में प्रवेश के लिए आयु-सीमा निर्धारित होती है, जबकि अनौपचारिक शिक्षा में ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती है। अनौपचारिक शिक्षा के द्वारा शिक्षा से वंचित समाज के पिछड़े लोगों एवं प्रौढ़ों को शिक्षित करने में सहायता मिलती है। अनौपचारिक शिक्षा में औपचारिक शिक्षा जैसे कठोर नियम नहीं होते ये अत्यधिक लचीले होते हैं। अनौपचारिक शिक्षा के जरिए औपचारिक शिक्षा से वंचित समाज के पिछड़े लोगों को शिक्षित करने में सहायता मिलती है। प्रौढ़ शिक्षा एवं स्त्री शिक्षा इसी का उदाहरण है। औपचारिक शिक्षा समाजीय व्यवस्था की एक उपव्यवस्था के रूप में कार्य करती है। इस पर परिवार, संस्कृति, राज्य, धर्म, अर्थव्यवस्था एवं समाज के स्पष्ट प्रभाव होता है, क्योंकि यह इन सभी से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित होता है। सिर्फ शिक्षा पर ही समाज का प्रभाव नहीं होता, बल्कि शिक्षा भी समाज को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। शिक्षा के परिणामस्वरूप ही भारत में स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुआ है। शहरीकरण, सामाजिक स्थितियों में बदलाव, संयुक्त परिवारों का एकल परिवारों के रूप में विभाजन ये सभी शिक्षा का समाज पर प्रभाव स्पष्ट करते हैं। निम्नलिखित में से किस शब्द का विपरीतार्थक शब्द प्रस्तुत गद्यांश में नहीं दिया गया है?

Table below shows the one a railway station according to a survey done in the month of January in year 2000. Study the table and answer the following questions: Percentage of trains arriving late नीचे दी गयी तालिका वर्ष 2000 के जनवरी के मास में किए गए सर्वेक्षण द्वारा एक रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ियों के आवागमन को दर्शाती है। तालिका का अध्ययन कीजिए और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिएः देर से पहुंचने वाली रेलगाड़ियों का प्रतिशत है

सभ्यता के पुराने दस्तावेज के रूप में खण्डहरों व भूमिगत सामग्रियों को देखा जाता है। जब व्यक्ति अपने आपको सामाजिक जीवन में ढालने लगा, तब से वह समय एकता में प्रदर्शित होता है। इस प्रदर्शन की सीमा को हड़प्पा व मोहनजोदडो से प्राप्त वस्तुओं से जान सकते हैं उनकी अभिव्यक्ति रहन-सहन, मोहरों, सिक्कों एवं बने-बनाए पक्के व अधपके खिलौनों से जान सकते हैं। उनकी धार्मिक भावना के रूप में कुण्ड की प्राप्ति हुई है, जिससे उनकी धार्मिक संवेदनाओं को जान सकते हैं। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं में ढहती सभ्यताओं की कहानी, जमीन में धंसे समय के काल को खोद कर देख सकते हैं। इससे इतिहास की टूटी कड़ियों का पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि कैसे नगरीय सभ्यता के स्थान पर ग्रामीण सभ्यता का विकास होता है। यह वैदिक युग में हुआ और इसी सभ्यता में भाषा की उपलब्धि हासिल हुई, जिसको संस्कृत के रूप में जाना जाता है। वैदिक युग में मानव ने जंगल से निकल ग्रामीण संस्कृति का निर्माण किया तथा समाज ने प्राकृतिक रूपों को ही अपने इष्ट के रूप में स्वीकारा, जिसकी अभिव्यक्ति ऋग्वेद के रूप में मिलती है। भाषा की यह वृत्ति केवल भारतभूमि पर ही सम्भव नहीं हुई, बल्कि विश्व के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलती है। संस्कृत भाषा की प्राथमिक जीवित रचना के रूप में ऋग्वेद का शास्त्रीय संस्कृत भाषा का सम्बन्ध है। संस्कृत भाषा अपनी समस्त स्थितियों में प्रयुक्त बहुल भाषा है, परन्तु वेदों में जो रूप प्रयुक्त हुए हैं, उनमें बाद के दिनों से अन्तर है। यही कारण है कि वैदिक भाषा का प्रभाव बाद के दिनों में अन्य भाषाओं में देखने को मिलता है, क्योंकि संस्कृत ही इन भाषाओं की जननी है। वर्तमान में भारतीय संविधान में संगृहीत सभी भाषाओं का प्रभाव देखा जाता है। किस युग में मानव ने ग्रामीण संस्कृति का निर्माण किया?

सभ्यता के पुराने दस्तावेज के रूप में खण्डहरों व भूमिगत सामग्रियों को देखा जाता है। जब व्यक्ति अपने आपको सामाजिक जीवन में ढालने लगा, तब से वह समय एकता में प्रदर्शित होता है। इस प्रदर्शन की सीमा को हड़प्पा व मोहनजोदडो से प्राप्त वस्तुओं से जान सकते हैं उनकी अभिव्यक्ति रहन-सहन, मोहरों, सिक्कों एवं बने-बनाए पक्के व अधपके खिलौनों से जान सकते हैं। उनकी धार्मिक भावना के रूप में कुण्ड की प्राप्ति हुई है, जिससे उनकी धार्मिक संवेदनाओं को जान सकते हैं। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं में ढहती सभ्यताओं की कहानी, जमीन में धंसे समय के काल को खोद कर देख सकते हैं। इससे इतिहास की टूटी कड़ियों का पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि कैसे नगरीय सभ्यता के स्थान पर ग्रामीण सभ्यता का विकास होता है। यह वैदिक युग में हुआ और इसी सभ्यता में भाषा की उपलब्धि हासिल हुई, जिसको संस्कृत के रूप में जाना जाता है। वैदिक युग में मानव ने जंगल से निकल ग्रामीण संस्कृति का निर्माण किया तथा समाज ने प्राकृतिक रूपों को ही अपने इष्ट के रूप में स्वीकारा, जिसकी अभिव्यक्ति ऋग्वेद के रूप में मिलती है। भाषा की यह वृत्ति केवल भारतभूमि पर ही सम्भव नहीं हुई, बल्कि विश्व के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलती है। संस्कृत भाषा की प्राथमिक जीवित रचना के रूप में ऋग्वेद का शास्त्रीय संस्कृत भाषा का सम्बन्ध है। संस्कृत भाषा अपनी समस्त स्थितियों में प्रयुक्त बहुल भाषा है, परन्तु वेदों में जो रूप प्रयुक्त हुए हैं, उनमें बाद के दिनों से अन्तर है। यही कारण है कि वैदिक भाषा का प्रभाव बाद के दिनों में अन्य भाषाओं में देखने को मिलता है, क्योंकि संस्कृत ही इन भाषाओं की जननी है। वर्तमान में भारतीय संविधान में संगृहीत सभी भाषाओं का प्रभाव देखा जाता है। प्राथमिक शब्द है

सभ्यता के पुराने दस्तावेज के रूप में खण्डहरों व भूमिगत सामग्रियों को देखा जाता है। जब व्यक्ति अपने आपको सामाजिक जीवन में ढालने लगा, तब से वह समय एकता में प्रदर्शित होता है। इस प्रदर्शन की सीमा को हड़प्पा व मोहनजोदडो से प्राप्त वस्तुओं से जान सकते हैं उनकी अभिव्यक्ति रहन-सहन, मोहरों, सिक्कों एवं बने-बनाए पक्के व अधपके खिलौनों से जान सकते हैं। उनकी धार्मिक भावना के रूप में कुण्ड की प्राप्ति हुई है, जिससे उनकी धार्मिक संवेदनाओं को जान सकते हैं। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं में ढहती सभ्यताओं की कहानी, जमीन में धंसे समय के काल को खोद कर देख सकते हैं। इससे इतिहास की टूटी कड़ियों का पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि कैसे नगरीय सभ्यता के स्थान पर ग्रामीण सभ्यता का विकास होता है। यह वैदिक युग में हुआ और इसी सभ्यता में भाषा की उपलब्धि हासिल हुई, जिसको संस्कृत के रूप में जाना जाता है। वैदिक युग में मानव ने जंगल से निकल ग्रामीण संस्कृति का निर्माण किया तथा समाज ने प्राकृतिक रूपों को ही अपने इष्ट के रूप में स्वीकारा, जिसकी अभिव्यक्ति ऋग्वेद के रूप में मिलती है। भाषा की यह वृत्ति केवल भारतभूमि पर ही सम्भव नहीं हुई, बल्कि विश्व के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलती है। संस्कृत भाषा की प्राथमिक जीवित रचना के रूप में ऋग्वेद का शास्त्रीय संस्कृत भाषा का सम्बन्ध है। संस्कृत भाषा अपनी समस्त स्थितियों में प्रयुक्त बहुल भाषा है, परन्तु वेदों में जो रूप प्रयुक्त हुए हैं, उनमें बाद के दिनों से अन्तर है। यही कारण है कि वैदिक भाषा का प्रभाव बाद के दिनों में अन्य भाषाओं में देखने को मिलता है, क्योंकि संस्कृत ही इन भाषाओं की जननी है। वर्तमान में भारतीय संविधान में संगृहीत सभी भाषाओं का प्रभाव देखा जाता है। निम्नलिखित में से कौन-सी विश्व की पहली साहित्यिक रचमा मानी जाती है

सभ्यता के पुराने दस्तावेज के रूप में खण्डहरों व भूमिगत सामग्रियों को देखा जाता है। जब व्यक्ति अपने आपको सामाजिक जीवन में ढालने लगा, तब से वह समय एकता में प्रदर्शित होता है। इस प्रदर्शन की सीमा को हड़प्पा व मोहनजोदडो से प्राप्त वस्तुओं से जान सकते हैं उनकी अभिव्यक्ति रहन-सहन, मोहरों, सिक्कों एवं बने-बनाए पक्के व अधपके खिलौनों से जान सकते हैं। उनकी धार्मिक भावना के रूप में कुण्ड की प्राप्ति हुई है, जिससे उनकी धार्मिक संवेदनाओं को जान सकते हैं। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं में ढहती सभ्यताओं की कहानी, जमीन में धंसे समय के काल को खोद कर देख सकते हैं। इससे इतिहास की टूटी कड़ियों का पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि कैसे नगरीय सभ्यता के स्थान पर ग्रामीण सभ्यता का विकास होता है। यह वैदिक युग में हुआ और इसी सभ्यता में भाषा की उपलब्धि हासिल हुई, जिसको संस्कृत के रूप में जाना जाता है। वैदिक युग में मानव ने जंगल से निकल ग्रामीण संस्कृति का निर्माण किया तथा समाज ने प्राकृतिक रूपों को ही अपने इष्ट के रूप में स्वीकारा, जिसकी अभिव्यक्ति ऋग्वेद के रूप में मिलती है। भाषा की यह वृत्ति केवल भारतभूमि पर ही सम्भव नहीं हुई, बल्कि विश्व के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलती है। संस्कृत भाषा की प्राथमिक जीवित रचना के रूप में ऋग्वेद का शास्त्रीय संस्कृत भाषा का सम्बन्ध है। संस्कृत भाषा अपनी समस्त स्थितियों में प्रयुक्त बहुल भाषा है, परन्तु वेदों में जो रूप प्रयुक्त हुए हैं, उनमें बाद के दिनों से अन्तर है। यही कारण है कि वैदिक भाषा का प्रभाव बाद के दिनों में अन्य भाषाओं में देखने को मिलता है, क्योंकि संस्कृत ही इन भाषाओं की जननी है। वर्तमान में भारतीय संविधान में संगृहीत सभी भाषाओं का प्रभाव देखा जाता है। संस्कृत को किन भाषाओं की जननी बताया गया है?

सभ्यता के पुराने दस्तावेज के रूप में खण्डहरों व भूमिगत सामग्रियों को देखा जाता है। जब व्यक्ति अपने आपको सामाजिक जीवन में ढालने लगा, तब से वह समय एकता में प्रदर्शित होता है। इस प्रदर्शन की सीमा को हड़प्पा व मोहनजोदडो से प्राप्त वस्तुओं से जान सकते हैं उनकी अभिव्यक्ति रहन-सहन, मोहरों, सिक्कों एवं बने-बनाए पक्के व अधपके खिलौनों से जान सकते हैं। उनकी धार्मिक भावना के रूप में कुण्ड की प्राप्ति हुई है, जिससे उनकी धार्मिक संवेदनाओं को जान सकते हैं। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं में ढहती सभ्यताओं की कहानी, जमीन में धंसे समय के काल को खोद कर देख सकते हैं। इससे इतिहास की टूटी कड़ियों का पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि कैसे नगरीय सभ्यता के स्थान पर ग्रामीण सभ्यता का विकास होता है। यह वैदिक युग में हुआ और इसी सभ्यता में भाषा की उपलब्धि हासिल हुई, जिसको संस्कृत के रूप में जाना जाता है। वैदिक युग में मानव ने जंगल से निकल ग्रामीण संस्कृति का निर्माण किया तथा समाज ने प्राकृतिक रूपों को ही अपने इष्ट के रूप में स्वीकारा, जिसकी अभिव्यक्ति ऋग्वेद के रूप में मिलती है। भाषा की यह वृत्ति केवल भारतभूमि पर ही सम्भव नहीं हुई, बल्कि विश्व के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलती है। संस्कृत भाषा की प्राथमिक जीवित रचना के रूप में ऋग्वेद का शास्त्रीय संस्कृत भाषा का सम्बन्ध है। संस्कृत भाषा अपनी समस्त स्थितियों में प्रयुक्त बहुल भाषा है, परन्तु वेदों में जो रूप प्रयुक्त हुए हैं, उनमें बाद के दिनों से अन्तर है। यही कारण है कि वैदिक भाषा का प्रभाव बाद के दिनों में अन्य भाषाओं में देखने को मिलता है, क्योंकि संस्कृत ही इन भाषाओं की जननी है। वर्तमान में भारतीय संविधान में संगृहीत सभी भाषाओं का प्रभाव देखा जाता है। कौन-सी सभ्यता पहले विद्यमान थी?