Home
Class 12
PHYSICS
दो स्लिटें 1 मिलीमीटर दूर बनाई गई हैं और...

दो स्लिटें 1 मिलीमीटर दूर बनाई गई हैं और पर्दे को एक मीटर दूर रखा गया है। प्रत्येक स्लिट की चौड़ाई कितनी होनी चाहिए जिससे कि एकल स्लिट पैटर्न के केंद्रीय उच्चिष्ठ के भीतर द्विस्लिट पैटर्न के 10 उच्चिष्ठ प्राप्त हो सकें?

Promotional Banner

Similar Questions

Explore conceptually related problems

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। प्रस्तुत गद्यांश में निम्नलिखित में से किस ऋषि का उल्लेख नहीं है?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। प्रस्तुत गद्यांश में निम्नलिखित में किस ग्रन्थ का उल्लेख नहीं है?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। प्राचीन भारत में शिक्षक को किसके समतुल्य समझा जाता था?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। ग्रन्थ में यह कहा गया है कि गुरु की सेवा से स्वर्ग की प्राप्ति होती है?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। निम्नलिखित में से कौन-सा गुण शिक्षक में होना चाहिए?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। निम्नलिखित में से कौन-सा शिक्षक का समानार्थी नहीं है?

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। जिसका मन शान्त हो, उसे कहा जाता है

प्राचीन भारत में शिक्षक को पिता से अधिक महान् बताया गया है। समाज में उसका स्थान सर्वोच्च था। श्वेताश्वतरोपनिषद् में गुरु को ईश्वर के पद पर रखकर उसे परम श्रद्धास्पद बताया गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानता रूपी अन्धकार को दूर भगाता था और समाज को एक नई शिक्षा देता था। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में इसीलिए कहा गया है कि शिष्य को अपने गुरु को भगवान की भाँति मानना चाहिए। गुरु के प्रति श्रद्धा की भावना का प्रमाण एकलव्य की शिक्षा कथा से मिलता है। गुरु की सेवा से शिष्य को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। मत्स्य पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य, अग्नि और गुरु की सुश्रूषा से स्वर्ग को प्राप्त करता है। अत: आचार्य एवं माता-पिता आदि का अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि आचार्य ब्रह्मा का, पिता प्रजापति का और माता पृथ्वी की स्वरूप है। एक अन्य स्थान पर यह कहा गया है कि आचार्य की यलपूर्वक पूजा करनी चाहिए, क्योंकि जहाँ आचार्य की पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। शिक्षक उच्च चरित्र वाला, अपने विषय में पारंगत, वाक्-चतुर, तार्किक, रोचक कथाओं का ज्ञाता एवं सदाचारी होता था। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि शिक्षक को विनयी, विनम्र, निष्पक्ष, नैष्ठिक, ब्रह्मचारी, शान्त-चित्त, प्रखर बुद्धि वाला तथा व्याख्या करने में कुशल होना चाहिए। शिक्षक के लिए आचार्य, उपाध्याय, गुरु, अध्यापक आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। वैसे तो यह समानार्थक प्रतीत होते हैं, परन्तु उनमें भिन्नता है। आचार्य उपनयन के पश्चात् अपने शिष्यों को आचार की भी शिक्षा देता था। याज्ञवल्क्य उपनयन के पश्चात् वेद पढ़ाने वाले को आचार्य मानते हैं। मनु के अनुसार, जो ब्राह्मण, शिष्य का यज्ञोपवीत करके उपनिषद् सहित सब वेद की शाखा को पढ़ाता है उसे आचार्य कहा जाता है। अपने शिष्यों से जो धन आदि लेकर परिवार का पालन-पोषण करता था उसे उपाध्याय की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। मनु ने उपाध्याय की परिभाषा बताते हुए कहा है कि जो वेद के एक देश अर्थात् मन्त्र एवं ब्राह्मण भाग को तथा वेद के अंग, व्याकरण आदि को जीविका के लिए पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहा जाता है, जो गर्भाधान आदि संस्कारों को विधि-पूर्वक करता है और अन्नादि के द्वारा अपने परिवार को बढ़ाता है अर्थात् पालन करता है वह ब्राह्मण, गुरु कहा जाता है। वरण किया हुआ जो ब्राह्मण अग्न्याधेय, पाकयज्ञ और अग्निस्टोम आदि यज्ञों को जिसकी ओर से करता था, वह उसका ऋत्विक कहलाता था। 'ब्रह्मलोक' में कौन-सा समास है?

Six tablets T1, T2, T3, T4, T5 and T6 are placed in a row facing towards North (Not necessarily in the same order). Two tablets are placed between T1 and T5. T3 is placed second to the right of T6. T2 is placed second to the right of T1. T5 is towards the left of T1. Which of the following pair of tablets represents the tablets to the immediate right of T6 and T5 respectively? छह गोलियाँ T1, T2, T3, T4, T5 और T6 को उत्तर की ओर एक पंक्ति में रखा गया है (जरूरी नहीं कि उसी क्रम में)। दो गोलियाँ T1 और T5 के बीच रखी गई हैं। T3 को T6 के दाईं ओर दूसरे स्थान पर रखा गया है। T2 को T1 के दाईं ओर रखा गया है। T5 T1 के बाईं ओर है। निम्न में से कौन सी टैबलेट क्रमशः T6 और T5 के दाईं ओर टैबलेट का प्रतिनिधित्व करती है?

Recommended Questions
  1. दो स्लिटें 1 मिलीमीटर दूर बनाई गई हैं और पर्दे को एक मीटर दूर रखा गया ...

    Text Solution

    |

  2. निम्नलिखित वाक्यों में से किन्हीं दो वाक्यों के रचना के अनुसार भेद पहच...

    Text Solution

    |

  3. एक 13 मीटर लम्बी सीढ़ी दीवार के सहारे झुकी हुई है। सीढ़ी के पाद को 1.5...

    Text Solution

    |

  4. एक बच्चो के पास ऐसा पासा है जिससे फलको पैर निम्नलिखित अक्षर है इस पासे...

    Text Solution

    |

  5. मीरा के पदों के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि वह भक्त की विपत्ति दूर करने के...

    Text Solution

    |

  6. 6328 Å तरंगदैर्ध्य का एक प्रकाश लम्बवत रूप से 0.2 mm चौड़ाई की झिरी पर...

    Text Solution

    |

  7. एकल स्लिट प्रयोग

    Text Solution

    |

  8. सन्दर्भ के अनुसार शब्दों के उपयुक्त चयन सम्बन्धी त्रुटियों को दूर करने...

    Text Solution

    |

  9. अंकित पूर्व दिशा की ओर चलना शुरू करता है | 30 मीटर चलने के बाद वह बाएं...

    Text Solution

    |