पृथ्वी एक बहुत बड़े चुम्बक की भाँति व्यवहार करती है, इस बात की पुष्टि अनेक प्रेक्षणों से होती है। यदि हम किसी छोटे चुम्बक को एक धागे के द्वारा स्वतंत्रतापूर्वक लटकाये तो वह सदैव एक निश्चित दिशा (उत्तर-दक्षिण) में आकर स्थिर हो जाता है। यह तभी सम्भव है जब पृथ्वी भी एक चुम्बक की भाँति व्यवहार करे, जिसका उत्तरी ध्रुव भौगोलिक दक्षिण दिशा में घुव दक्षिणी घुव भौगोलिक उत्तरी दिशा में हो।
यदि किसी कच्चे लोहे की छड़ को पृथ्वी की सतह के अन्दर उत्तर-दक्षिण दिशा में रखकर गाड़ दिया जाये तो कुछ समय पश्चात छड़ में चुम्बकीय क्षेत्र के द्वारा लोहे की छड़ का चुम्बकन है।
इसी प्रकार हम किसी चुम्बकीय सुई को इस प्रकार लटकाये कि वह ऊर्ध्वाधर तल में स्वतंत्रतापूर्वक घूम सके और इसे पृथ्वी के एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक ले जाये तो यह दो स्थानों पर पूर्णतः ऊर्ध्वाधर हो जाती है और दो स्थानों पर पूर्णतः ऊर्ध्वाधर हो जाती है और दो स्थानों पर पूर्णतः क्षैतिज, परन्तु अन्य स्थानों पर क्षैतिज से विभिन्न कोण बनाती हुए लटकती है। जिन दो स्थानों पर चुम्बकीय सुई पूर्णतः ऊर्ध्वाधर हो जाती है, वे स्थान पृथ्वी के चुम्बकीय ध्रुवो की स्थिति है।
भू-पार्थिव चुम्बकत्व के कारणों के विषय में अनेक सिद्धान्त समय-समय पर प्रस्तुत किये गए है। इनमे से कुछ मुख्य विचार निम्न है-
(1) नवीन खोजो के अनुसार पार्थिव चुम्बकत्व का कारण पृथ्वी की क्रोड में विभिन्न द्र्वीय परतो का असमान घूर्णन है। क्रोड की त्रिज्या लगभग 3500 किमी है व इसमें पिघला हुआ धात्विक द्रव आंशिक रूप से आयनित होता है। पृथ्वी के घूर्णन के साथ इस द्र्वीय पदार्थ का भी घूर्णन होता है, परन्तु बाह्य परतो में घूर्णन वेग आन्तरिक परतो के सापेक्ष कम होता है। आयनित पदार्थ के घूर्णन से विद्युत धाराएँ उत्पन्न है जिनके कारण पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।
(2) पृथ्वी के वायुमण्डल की बाह्य परत (आयन मण्डल) में आयनित अवस्था में गैसे स्थित है। जिस के अणुओं का आयनन अंतरिक्ष से आने वाली कॉस्मिक किरणे व सूर्य से प्राप्त उच्च ऊर्जा की किरणे (X-किरणे व पराबैंगनी किरणे) है। पृथ्वी के घूर्णन के साथ इन आयनित अणुओं में गति उत्पन्न होती है जो प्रबल विद्युत धाराओं को जन्म देती है। इन धाराओं के कारण पृथ्वी का चुम्बकन होता है और पृथ्वी चुम्बक की भाँति व्यवहार करती है।
भू-चुम्बकत्व के अवयव- किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का पूर्ण ज्ञात प्राप्त करने के लिए तीन राशियों को जानना आवश्यक है। इन्हे भू-चुम्बकत्व के अवयव कहते है। ये अवयव है-
(1) दिकपात का कोण- किसी स्थान पर अपने गुरुत्व केंद्र से स्वतंत्रतापूर्वक लटकी चुम्बकीय सुई की अक्ष से पारित ऊर्ध्वाधर तल को चुम्बकीय याम्योत्तर कहते है। इसी प्रकार, किसी स्थान पर पृथ्वी के भौगोलिक उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवो को मिलाने वाली रेखा तथा पृथ्वी के घूर्णन अक्ष में से गुजरने वाले ऊर्ध्वाधर तल को भौगोलिक याम्योत्तर कहते है।
किसी स्थान पर चुम्बकीय याम्योत्तर तथा वहाँ भौगोलिक याम्योत्तर के मध्य कोण को दिकपात का कोण कहते है। चित्र में इसे `theta` से प्रदर्शित किया गया है। विभिन्न स्थानों पर दिकपात कोण भिन्न होता है। संसार के भिन्न-भिन्न स्थानों के दिकपात नापकर उन्हें नक्शे पर दिखाया जाता है। दिल्ली में यह `0^(@)4.E` तथा मुम्बई में `0^(@)58W` है। नक्शे पर समान विकपात के स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समदिकपाती रेखाये तथा शून्य दिकपात के स्थानों को मिलाने वाली रेखा को शून्य दिकपाती रेखा कहते है।
(2) नमन या नति कोण- यदि किसी चुम्बकीय सुई को उसके गुरुत्व केंद्र से स्वतंत्रतापूर्वक इस प्रकार लटका दिया जाये कि वह ऊर्ध्वाधर तल में घूम सके, तो वह चुम्बकीय याम्योत्तर में स्थिर होने पर क्षैतिज रेखा के साथ जो कोण बनाती है, उसे नति कोण कहते है। सुई की चुम्बकीय अक्ष की दिशा पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की पूर्व तीव्रता की दिशा को प्रदर्शित करती है। अतः नति कोण वह कोण है जो चुम्बकीय याम्योत्तर में पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता की दिशा तथा क्षैतिज के मध्य बनता है। चित्र में इसे `phi` से प्रदर्शित किया गया है। नति कोण का मान पृथ्वी के चुम्बकीय ध्रुवो `90^(@)` होता है तथा चुम्बकीय निरक्ष पर `0^(@)` होता है।
(3) पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक-किसी स्थान पर चुम्बकीय याम्योत्तर में कार्य करने वाले पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता के क्षैतिज घटक को चुम्बकीय क्षेत्र का क्षैतिज घटक कहते है। इसे `B_(v)` प्रदर्शित करते है।
यदि किसी स्थान पर पृथ्वी के क्षेत्र की सम्पूर्ण तीव्रता हो तथा उस स्थान पर नति कोण `phi` हो, तो पृथ्वी के क्षेत्र का क्षैतिज घटक
`B_(V)=Icosphi`
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता के ऊर्ध्वाधर घटक को चुम्बकीय क्षेत्र का ऊर्ध्वाधर घटक कहते है तथा इसे `B_(v)` से प्रदर्शित करते है।
`B_(V)=Isinphi`
अतः `I=sqrt(B_(H)^(2)+B_(V)^(2))`
तथा `tanphi=(B_(v))/(B_(H))`