अपद्रव्यी अर्धचालक- किसी नैज अर्धचालक में यदि अत्यल्प मात्रा में उपयुक्त अपद्रव्य या अशुद्धि मिला दी जाये तो प्राप्त अर्धचालक की चालकता नैज अर्धचालक की तुलना में कई गुना अधिक हो जाती है।
कमरे के ताप पर शुद्ध अध्रचालक सिलिकॉन व जरमेनियम को चालकता बहुत कत होती है। इनकी चालकता बढ़ाने के लिए इनमें आवर्त तालिका का तीसरे या पांचवें ग्रुप का निश्चित तत्व अल्प मात्रा में मिलाया जाता है। इसे अपद्रव्य कहते हैं। जिन अर्धचालकों में अशुद्धि परमाणु मिलाये जाते हैं उन्हें डोप्ड अर्धचालक तथा प्रक्रिया को डोपिंग कहते हैं। अशुद्ध तत्व की मात्रा अत्यल्प होती है। नैज अर्धचालकों में लगभग `10^(6)` से `10^(10)` परमाणुओं में एक परमाणु अशुद्धि तत्व का होता है। अपद्रव्य युक्त अर्धचालक का बाह्य अर्धचालक कहते हैं। अपद्रव्य अर्धचालक दो प्रकार के होते हैं-
(i)N-प्रकार के अर्धचालक
(ii) P- प्रकार के अर्धचालक
P-N संधि- जब एक P प्रकार के अर्धचालक N प्रकार अर्धचालक से परमाण्वीय स्तर पर इस प्रकार जोड़ दिया जाये बनी रहे तो यह सम्पर्क सतह P-N संधि तथा इस प्रकार बनी युक्ति P-N संधि डायोड कहलाती है। वस्तुतः विशिष्ट विधियों द्वारा सिलिकॉन या जर्मेनियम एकल क्रिस्टल में इस प्रकार अशुद्धियां अपमिश्रित की जाती हैं कि इसके एक प्रभाव में P प्रकार का अर्धचालक व दूसरे प्रभाग में N प्रकार का अर्धचालक बन जाता है व इन क्षेत्रों के बीच की परिसीमा P-N संधि कहलाती है। एक P प्रकार के अर्धचालक को N प्रकार के अर्धचालक के साथ दबाकर सम्पर्कित करने पर P-N संधि नहीं बनाई जा सकती है क्योंकि इस अवस्था में सम्पर्क सतह पर क्रिस्टल संरचना संतत नहीं रहती है।
P-N संधि निर्मित होते ही N प्रकार के प्रभाग में विसरण आरम्भ करते है। इसी प्रकार P प्रभाग में उपस्थित बहुसंख्यक होल संधि को पार कर N प्रभाग मे विसरित होना प्रारंभ करते हैं। P प्रभाग में उपस्थित ऋणात्मक ग्राही आयन तथा `N` प्रभाग में उपस्थित धनात्मक दाता आयन आपने स्थान पर स्थिर रहते हैं। बहुसंख्यक आवेशों के विसरण की इस प्रक्रिया में संधि के पास के एक अतिसीमित क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन एवं होल परस्पर पुनः संयोजन करते हैं। इस प्रकार इस सीमित क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन व होल की संख्या में कमी आ जाती है। इस कारण संधि के निकट P क्षेत्र में ऋण आयनों की तथा N क्षेत्र में धन आयनों की परत बन जाती है। चूंकि इस परत के क्षेत्र में मुक्त अवक्षय परत कहलाती है। चित्र में दिखाया गया है।
आंकिक का हल
प्रश्नानुसार
अवक्षय परत की चौड़ाई d=1 माइक्रो मीटर
`=10^(6)` मीटर
रोधिका विभव `V_(B)=0.7` वोल्ट
`:.` संधि पर उत्पन्न अवरोधी विद्युत क्षेत्र
`E_(B)=(V_(B))/d=0.7/(10^(-6))`
`=0.7xx10^(6)=7xx10^(5)` वोल्ट/मीटरfig