प्रवर्धन- बहुधा विभिन्न उपकरणों जैसे माइक्रोफोन, रेडियो या टी.वी.स एन्टीना, रेडार आदि से प्राप्त संकेतों में वोल्टता, धारा व शक्ति अत्यल्प होती है। इनका समुचित उपयोगकरने के लिए यह आवश्यक होता है कि उनके प्रारूप को विकृत किये बिना उनका मान में वृद्धि की जाये। निवेशी संकेत के मान में वृद्धि करने की क्रिया को प्रवर्धन कहते हैं। वह युक्ति जिसके द्वारा निविष्ट संकेत का प्रवर्धन किया जाता है उसे प्रवर्धक कहते हैं।
उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक- चित्र में एक NPN उभयनिष्ठ उत्सर्जक परिपथ को प्रदर्शित किया गया है इसमें ट्रॉजिस्टर का उत्सर्जिक टर्मिनल निवेशी तथा निर्गम दोनों परिपथों में उभयनिष्ठ होता है । बेटरी `V_("BB")` उत्सर्जक- आधार संधि का अग्रदिशिक बायस प्रदान करती है तथा निवेशी प्रतिरोध `R_(i)` आधार धारा को नियंत्रित करता है। बैटरी `V_("CC")` आधार- संग्राहक संधि को उत्क्रमित बायस पर रखती है। प्रतिरोध `R_(L)` निर्गम परिपथ में लोड प्रतिरोध है। जिस संकेत वोल्टता को प्रवर्धित करना होता है उसे चित्र के अनुसार निवेशी परिपथ में लगाते हैं तथा प्रवर्धित संकेत वोल्टता लोड प्रतिरोध `R_(L)` पर प्राप्त होती है । इस विन्यास के संयोजन में निर्गत धारा `I_(C)` निवेशी धारा `I_(B)` से प्रभावित होती है।
निवेशी संकेत वोल्टता के कारण उत्सर्जक-आधार संधि पर अग्रदिशिक बायस वोल्टता का मान परिवर्तित होगा जिससे धारा `I_(C)` का मान संकेत के अनुसार परिवर्तित हो जायेगा `Deltal_(C)=betaI_(B)` जहां `beta` धारा प्रवर्धन गुणांक है जिसका मान 1 से बहुत अधिक होता है। इस कारण निर्गम परिपथ में लगे लोड प्रतिरोध `R_(L)` के सिरों के मध्य संकेत के अनुरूपी परंतु `pi` कलान्तर के साथ विभव का पतन होगा जिसके फलस्वरूप प्रवर्धित निर्गत संकेत वोल्अता प्राप्त होगी।
बैण्ड सिद्धांत के आधार पर चालक, अचालक व अर्द्धचालक में विभेदन- किसी भी पदार्थ की चालकता मुक्त इलेक्ट्रॉन की संख्या पर निर्भर करती है। वर्जित ऊर्जा अंतराल `DeltaEg` के बराबर या इससे अधिक ऊर्जा देने से संयोजी बैण्ड के इलेक्ट्रॉन , चालक बैण्ड में चले जाते है और मुक्त हो जाते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि किसी भी पदार्थ की चालकता वर्जित ऊर्जा अंतराल पर निर्भर, करती है। पदार्थों को ऊर्जा बैण्ड के आधार पर तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है
1. कुचालक या विद्युतरोधी 2. चालक या धातुएं 3. अर्द्धचालक।
चालक
1. वे ठोस जिनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन की संख्या बहुत होती है चालक कहलाते हैं।
2. सामान्य ताप पर इनकी चालकता का मान बहुत ज्यादा होता है।
3. ताप बढ़ाने पर इनकी प्रतिरोधकता का मान बढ़ता है और चालकता का मान कम होता है।
4. इनका प्रतिरोध ताप गुणांक धनात्मक होता है।
5. इनमें संयोजी बैण्ड पूर्णतः भरा हुआ नहीं होता है अर्थात इनमें रिक्त ऊर्जा स्तर होते हैं।
6. इसमें वर्जित बैण्ड लगभग शून्य होता है।
7. इनमें संयोजी बैण्ड और चालक बैण्ड अतिव्यापित होते हैं।
8. इनमें धारा केवल इलेक्ट्रॉन के प्रवाह के कारण प्राप्त होती है।
9. उदाहरण- चांदी, सोना, तांबा, एल्यूमिनियम आदि।
कुचालक-(विद्युतरोधी)
1. वे ठोस जिनमें सामन्य ताप पर मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या नगण्य होती है, कुचालक नाम से जाने जाते हैं।
2. सामान्य ताप पर इनकी चालकता नगण्य होती है।
3. ताप बढ़ाने पर इनकी चालकता में वृद्धि होती है।
4. इनका प्रतिरोध ताप गुणांक ऋणात्मक होता है।
5. इनमें सामान्य ताप पर संयोजी बेण्ड पूर्णतः भरा हुआ होता है।
6. इनमें सामान्य ताप पर चालक बैण्ड पूर्णतः रिक्त होता है।
7. इनमें वर्जित ऊर्जा बैण्ड (अंतराल) बहुत अधिक होता है।
8. इनमें धारा का प्रवाह नगण्य होता है।
9. इनमें हीरे के लिए वर्जित ऊर्जा बैण्ड लगभग 6eV होता है।
10. उदाहरण- अभ्रक, लकड़ी, हीरा, प्लास्टिक इत्यादि
अर्द्धचालक
1. वे पदार्थ जिनकी चालकता, कुचालक और सुचालक के मध्य स्थित होती है, अर्द्धचालक कहे जाते हैं। स्पष्टतः इनकी चालकता का मान चालक से कम लेकिन कुचालक से जयादा होता है।
2. ताप पर मुक्त इलेक्ट्रॉन और होल बहुत कम संख्या में पाये जाते हैं।
3. परम शून्य ताप पर इनमें संयोजकता बैण्ड पूरी तरह भरा हुआ एवं चालक बैण्ड पूर्णतया रिक्त होता है।