प्रत्यावर्ती धारा-यह विद्युत धारा जो समान समय अंतरालों के पश्चात् अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती हैं, उसे प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं। इसे प्रतीकानुसार A.C के द्वारा निरूपित किया जाता है ।
प्रत्यावर्ती विद्युत धारा जनित्र विद्युत चुम्बकीय प्रेरणा के सिद्धान्त पर आधारित है । जब भी कुंडली को किसी चुम्बकीय क्षेत्र के सापेक्ष घुमाया जाता है, तब कुंडली में से गुजरने वाली चुम्बकीय रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होता है, अत: कुंडली में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है ।
बनावट-(i) ABCD आर्मेचर अपने अक्ष के चारों तरफ घूर्णनशील होता है।
(ii) आर्मेचर के ऊपर अवरोधी तांबे के तार लिपटे हुए होते हैं।
(iii) ताँबे के तारों के दो सिरे धातु के बने दो वलय `R_(1)` एवं `R_(2)` से जुड़े होते हैं ये दोनों वलय स्थिर दो कार्बन ब्रशों `B_(1)` एवं `B_(2)` से सम्पर्क में रहते हैं ।
(iv) दोनों ब्रशों का सम्पर्क गैल्वेनोमीटर (G) से होता है।
कार्यविधि-(i) आर्मेचर को यांत्रिक रूप से दो शक्तिशाली चुम्बकों के धरुवों के बीच घुमाया जाता है ।
(ii) दो वलय भी घूमते हैं लेकिन दोनों वलय अलग- अलग दोनों कार्बन ब्रशों के सम्पर्क में रहते हैं ।
(iii) गति के समय जब AB भुजा ऊपर एवं CD नीचे की तरफ होती है, आर्मेचर में धारा की दिशा A से B और C से D होती है।
(iv) यदि आर्मेचर की भुजा CD ऊपर और AB नीचे हो, तो फ्लेमिंग के दायें हाथ के नियम से धारा की दिशा D से C और B और A की तरफ हो जाती है।
अतः प्रत्येक आधे घूर्णन के पश्चात् क्रमिक रूप से इन भुजाओं में विद्युत धारा की ध्रुवता परिवर्तित होती रहती है। ऐसी विद्युत धारा जो समान काल-अन्तरालों के पश्चात् अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती है, उसे प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं। विद्युत उत्पन्न करने की इस युक्ति को प्रत्यावर्ती विद्युत धारा जनित्र कहते हैं।