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अनुवांशिक विविधता क्या है ? जैव विविधता ...

अनुवांशिक विविधता क्या है ? जैव विविधता संकट के दो कारणों को समझाइये।

लिखित उत्तर

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एक ही प्रजाति के विभिन्न सदस्यों के बीच आनुवांशिक इकाई जीन के कारण पाई जाने वाली भिन्नता आनुवांशिक विविधता कहलाती है। यह विविधता एक प्रजाति के विभिन्न जनसंख्या समूहों के मध्य या एक जनसंख्या वाले विभिन्न सदस्यों के बीच पाई जाती है।
जैव-विविधता संकट के कारण निम्नलिखित हैं-
(1) प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना–प्रत्येक जीव-जन्तु के लिए एक निश्चित आवास प्रकृति ने निर्धारित किया है जिसमें रहकर वह प्रकृति के नियमों के अन्तर्गत अपना जीवन-यापन कर अपनी संख्या में वृद्धि करता है। विश्व की बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हम इन प्राकृतिक आवासों को नष्ट कर आबादी व कृषि भूमि का विस्तार कर रहे हैं। पृथ्वी पर 50 लाख से 3 करोड़ प्रजातियाँ निवास करती हैं जिनमें से 50 प्रतिशत से अधिक प्रजातियाँ ऊष्ण कटिबंधीय वनों में पाई जाती हैं। किन्तु आज ये वन 1.7 करोड़ हेक्टेयर प्रतिवर्ष की दर से काटे जा रहे हैं यदि इसी दर से उष्णकटिबंधीय वनों की कटाई होती रही तो एक सैद्धान्तिक अनुमान के अनुसार आने वाले 30 वर्षों में उक्त वनों की 5 से 10 प्रतिशत वनस्पति व जन्तु प्रजातियाँ विलुप्त हो जाएँगी।
(2) प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित विदोहन–स्थानीय आवश्यकताओं के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं है। लेकिन मनुष्य ने व्यावसायिक लाभ के लिए पेड़-पौधों एवं जीव-जन्तुओं का अत्यधिक व अनियंत्रित दोहन किया है जिस कारण कई प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। उदाहरणार्थ यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका में मेंढक की टाँगों का उपयोग खाने में स्वाद बढ़ाने के लिए होता है। भारत समेत कई एशियाई देश मेंढक की टाँगों का निर्यात करते हैं।वर्ष 1983 में भारत में 3650 मेट्रिक टन मेंढक की टाँगें निर्यात की जिसके फलस्वरूप जंगलों में मेंढकों की संख्या कम होती गई तथा ऐसे कीट जिन्हें मेंढक खाते थे, की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हो गई।
(3) विदेशी प्रजातियों का आक्रमण-वांछित या अवांछित रूप से कई बार विदेशी प्रजातियों के आने से स्थानीय प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है तथा पूरे पारिस्थितिक तंत्र में असंतुलन पैदा कर देता है। कुछ पादप प्रजातियों के सौंदर्यीकरण के लिये आयात किया गया जैसे लैन्टाना व जलकुम्भी। लैन्टाना को अंग्रेज 1808 में भारत लाए थे तथा कोलकाता के बॉटनिकल गार्डन में लगाया था किन्तु यह धीरे-धीरे सारे उपमहाद्वीप में फैल गया। आज यह पौधा स्थानीय जैव-विविधता के लिए संकट बना हुआ है क्योंकि यह अपने आस-पास में दूसरे पौधों को उगने नहीं देता और न ही इसे जानवर खाते हैं।
(4) प्राकृतिक आवास विखंडन-वन्य प्राणियों के प्राकृतिक आवास जो पहले विस्तृत क्षेत्र में अविभक्त रूप से फैले थे आज सड़क मार्ग, रेलमार्ग, गैस पाइप लाइन, विद्युत लाइन, बाँध, खेत आदि के निर्माण से विखण्डित हो गए हैं जिससे वन्य जीवों के प्राकृतिक क्रियाकलाप प्रभावित होते हैं तथा वे अपने को इन गतिविधियों से असुरक्षित महसूस करते हैं। वन्य प्राणी वाहनों की चपेट में आ जाते हैं अथवा मानव बस्ती में आने से लोगों द्वारा मार दिए जाते हैं।
(5) पर्यावरण प्रदूषण—पर्यावरण प्रदूषण का दुष्प्रभाव प्राणियों तथा पौधों पर पड़ता है। औद्योगिक अपशिष्ट से प्रदूषित भूमि व जल में अनेक वनस्पति व जीव नष्ट हो जाते हैं। अत्यधिक वायु प्रदूषण के कारण होने वाली अम्ल वर्षा से भी अनेक सूक्ष्म जीव व वनस्पति नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार कृषि पैदावार बढ़ाने हेतु रासायनिक खाद व कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मृदा में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीव विलुप्त हो रहे हैं जिससे भूमि की उर्वरता भी प्रभावित हो रही है।
(6)जलवायु परिवर्तन—मानव गतिविधियों से आज पृथ्वी पर ग्रीन-हाउस गैसों की मात्रा अत्यधिक बढ़ गई है, इस कारण पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। पृथ्वी का तापमान बढ़ने से ध्रुवों पर जमी बर्फ तेजी से पिघल रही है। समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। इस कारण एक और समुद्री जैव-विविधता पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है वहीं उपलब्ध भूमि में कमी होने से स्थलीय जैव-विविधता भी प्रभावित हो रही है। एक अनुमान के अनुसार यदि पृथ्वी का तापमान 3.0 डिग्री सेन्टीग्रेड बढ़ता है तो विश्व की 70 प्रतिशत प्रजातियों पर विलुप्ति का खतरा मंडराने लगा।
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