जैव-विविधता के महत्व को विस्तारपूर्वक समझाइए|
जैव-विविधता के महत्व को विस्तारपूर्वक समझाइए|
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जैव विविधता के महत्व- जैवविधता एक प्रकार से प्राकृतिक संसाधन है जिनमे विभिन्न जीवों के लील्ये प्राकृतिक एवं जैविक स्त्रोत मिलते है| इससे मनुष्य की आहारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति होती है| जैवविधता का महत्व निम्न रूपों में देखा जा सकता है|
(1) औषधीय महत्व- प्राचीन काल से ही जड़ी-बूटियों का उपयोग अनेक प्रकार की बीमारियों के इलाज में किया जाता रहा है| एक अनुमान के अनुसार आज लगभग 40 प्रतिशत उपलब्ध औषिधियों को वनस्पतियों से प्राप्त किया जाता है|
पृथ्वी पर समय-समय पर कई असाध्य बीमारियां आई है जिनका इलाज जैवविविधता ने ही खोजै है| असाध्य मलेरिया ज्वर का इलाज सिनकोना पादप की छाल में मिला| इसी प्रकार सदाबहार विनक्रिस्टीन तथा विनब्लास्टिन पौधों का उपयोग असाध्य रक्त कैंसर के उपचार में होता है|
(2) आर्थिक महत्व- जैवविविधता हमें प्रत्यख रूप से भोजन, ईंधन, चारा, इमारती, लकड़ी, आघोगिक कच्चा माल उपलब्ध कराती है| जैव विविधता के कारण ही हमें विविधता पूर्ण भोजन, धान, अनाज, फल, सब्जियाँ मिलती है|
बढ़ती जनसँख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जैव-विविधता का उपयोग कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोगरोधी तथा कीटरोधी फसलों की किस्मों के विकास में किया जा रहा है, उदाहरणार्थ-हरित क्रांति के लिए उत्तरदायी गेहूं की बौनी किस्मों का विकास जापान में पाए जाने वाले नारीं -10 नामक गेहूं की किस्म में तथा धान की बौनी किस्मों का विकास ताईवान में पायी जाने वाली डी-जियो-रु जेन नामक धान की प्रजाति से किया गया था|
वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व पेट्रोलियम पदार्थों के सिमित संसाधनों तथा उनके अनियंत्रित विदोहन से चिंतित है| ऐसे में जैट्रोपा व करंज जैसे पौधों ने एक नै आशा की किरण जगाई है क्यूंकि इन पौधों के बीजों से जैव ईंधन बनाया जा सकता है इन पौधों को बायोडीजल वृक्ष कहा जाने लगा है|
(3) सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व- वर्तमान आधुनिक व उपभोक्तावादी प्रवृति से पूर्व मानव व प्रकृति में एक सार्मजस्य था| वर्तमान में भी कुछ आदिवासी समाज ऐसे है जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पूर्ण रूप से प्रकृति पर निर्भर है| कुछ वनस्पतियों जैसे पीपल, बरगद, आम, तुलसी केला आदि का आज भी हमारी संस्कृति में विशेष स्थान है तथा कुछ त्योहारों पर हम इनकी पूजा करते है| इसी प्रकार कुछ जंतु जैसे गाय, मोर, हंस,चूहा, हाथी आदि का भी हमारी संस्कृति में विशेष स्थान है| हमारे देश में आज भी ऐसे वन है जिन्हे देववन कहा जाता है एवं लोग स्वेछ्य से इन स्थानों को संरक्षण प्रदान करते है|
(4) खाद्य श्रृंखला का संरक्षण- खाद्य श्रृंख्ला में एक जाती दूसरी जाती दूसरी जाती का भक्षण करती है अर्थात प्रत्येक प्रजाति किसी दूसरी प्रजाति पर निर्भर रहती है| अतः किसी भी एक प्रजाति के विलुप्त होने से पूरी खाद्य -श्रृंखला के खत्म होने का खतरा बना रहता है| किन्तु जैवविविधता समृद्ध है तो उसमे विभिन्न खाद्य-श्रृंखलाएं होंगी जिनसे खाद्य जाल (Food web) बनता है| किसी खाद्य-श्रृंखला में किसी एक प्रजाति के कम होने पर खाद्य जाल की अन्य प्रजाति उसकी कमी को पूरा कर खाद्य -श्रृंखला कर सकती है|
(ii) पर्यावरणीय महत्व- (i) जैव-विविधता पर्यावरण प्रदुषण के निस्तारण में भी महत्पूर्ण भूमिका निभाती है| कुछ वनस्पतियों प्रदूषकों का विघटन व अवशोषण करने का गुण रखती है| जैसे- सदाबहार नामक पौधे में ट्राइनाइ ट्रोटोलुइन जैसे घातक विस्फोटक को विघटित करने की क्षमता होती है| सूक्ष्म जीवों स्यूडोमोनास प्यूडिडा आथरोवेक्टर विस्कोसस साइटोबेक्टर प्रजातियों में औघोगिक अपशिष्ट से भारी धातुओं को हटाने की क्षमता होती है|
(iii) पोषक चक्र नियंत्रण- जैव-विविधता पोषक चक्र गतिमान रखने से सहायक होती है| मिटटी की सूक्ष्मजीवी विविधता पौधों व जीवों के मृत भागों को विघटित कर पोषक तत्व पुनः पौधों को उपलब्ध कराने में सहायक होती है| इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है|
(1) औषधीय महत्व- प्राचीन काल से ही जड़ी-बूटियों का उपयोग अनेक प्रकार की बीमारियों के इलाज में किया जाता रहा है| एक अनुमान के अनुसार आज लगभग 40 प्रतिशत उपलब्ध औषिधियों को वनस्पतियों से प्राप्त किया जाता है|
पृथ्वी पर समय-समय पर कई असाध्य बीमारियां आई है जिनका इलाज जैवविविधता ने ही खोजै है| असाध्य मलेरिया ज्वर का इलाज सिनकोना पादप की छाल में मिला| इसी प्रकार सदाबहार विनक्रिस्टीन तथा विनब्लास्टिन पौधों का उपयोग असाध्य रक्त कैंसर के उपचार में होता है|
(2) आर्थिक महत्व- जैवविविधता हमें प्रत्यख रूप से भोजन, ईंधन, चारा, इमारती, लकड़ी, आघोगिक कच्चा माल उपलब्ध कराती है| जैव विविधता के कारण ही हमें विविधता पूर्ण भोजन, धान, अनाज, फल, सब्जियाँ मिलती है|
बढ़ती जनसँख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जैव-विविधता का उपयोग कृषि पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ रोगरोधी तथा कीटरोधी फसलों की किस्मों के विकास में किया जा रहा है, उदाहरणार्थ-हरित क्रांति के लिए उत्तरदायी गेहूं की बौनी किस्मों का विकास जापान में पाए जाने वाले नारीं -10 नामक गेहूं की किस्म में तथा धान की बौनी किस्मों का विकास ताईवान में पायी जाने वाली डी-जियो-रु जेन नामक धान की प्रजाति से किया गया था|
वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व पेट्रोलियम पदार्थों के सिमित संसाधनों तथा उनके अनियंत्रित विदोहन से चिंतित है| ऐसे में जैट्रोपा व करंज जैसे पौधों ने एक नै आशा की किरण जगाई है क्यूंकि इन पौधों के बीजों से जैव ईंधन बनाया जा सकता है इन पौधों को बायोडीजल वृक्ष कहा जाने लगा है|
(3) सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व- वर्तमान आधुनिक व उपभोक्तावादी प्रवृति से पूर्व मानव व प्रकृति में एक सार्मजस्य था| वर्तमान में भी कुछ आदिवासी समाज ऐसे है जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पूर्ण रूप से प्रकृति पर निर्भर है| कुछ वनस्पतियों जैसे पीपल, बरगद, आम, तुलसी केला आदि का आज भी हमारी संस्कृति में विशेष स्थान है तथा कुछ त्योहारों पर हम इनकी पूजा करते है| इसी प्रकार कुछ जंतु जैसे गाय, मोर, हंस,चूहा, हाथी आदि का भी हमारी संस्कृति में विशेष स्थान है| हमारे देश में आज भी ऐसे वन है जिन्हे देववन कहा जाता है एवं लोग स्वेछ्य से इन स्थानों को संरक्षण प्रदान करते है|
(4) खाद्य श्रृंखला का संरक्षण- खाद्य श्रृंख्ला में एक जाती दूसरी जाती दूसरी जाती का भक्षण करती है अर्थात प्रत्येक प्रजाति किसी दूसरी प्रजाति पर निर्भर रहती है| अतः किसी भी एक प्रजाति के विलुप्त होने से पूरी खाद्य -श्रृंखला के खत्म होने का खतरा बना रहता है| किन्तु जैवविविधता समृद्ध है तो उसमे विभिन्न खाद्य-श्रृंखलाएं होंगी जिनसे खाद्य जाल (Food web) बनता है| किसी खाद्य-श्रृंखला में किसी एक प्रजाति के कम होने पर खाद्य जाल की अन्य प्रजाति उसकी कमी को पूरा कर खाद्य -श्रृंखला कर सकती है|
(ii) पर्यावरणीय महत्व- (i) जैव-विविधता पर्यावरण प्रदुषण के निस्तारण में भी महत्पूर्ण भूमिका निभाती है| कुछ वनस्पतियों प्रदूषकों का विघटन व अवशोषण करने का गुण रखती है| जैसे- सदाबहार नामक पौधे में ट्राइनाइ ट्रोटोलुइन जैसे घातक विस्फोटक को विघटित करने की क्षमता होती है| सूक्ष्म जीवों स्यूडोमोनास प्यूडिडा आथरोवेक्टर विस्कोसस साइटोबेक्टर प्रजातियों में औघोगिक अपशिष्ट से भारी धातुओं को हटाने की क्षमता होती है|
(iii) पोषक चक्र नियंत्रण- जैव-विविधता पोषक चक्र गतिमान रखने से सहायक होती है| मिटटी की सूक्ष्मजीवी विविधता पौधों व जीवों के मृत भागों को विघटित कर पोषक तत्व पुनः पौधों को उपलब्ध कराने में सहायक होती है| इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है|