ऐल्डिहाइडस तथा कीटोन्स के सामान्य तथा आइ०यू०पी०ए०सी० नाम क्या होते हैं?
ऐल्डिहाइडस तथा कीटोन्स के सामान्य तथा आइ०यू०पी०ए०सी० नाम क्या होते हैं?
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गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। भारत की शस्यश्यामला भूमि में जो निसर्ग-सिद्ध सुषमा है, उस पर भारतीय कवियों का चिरकाल से अनुराग रहा है। यों तो प्रकृति की साधारण वस्तुएँभी मनुष्यमात्र के लिए आकर्षक होती हैं, परन्तु उसकी सुन्दरतम विभूतियों __ में मानव वृत्तियाँ विशेष प्रकार से रमती हैं। अरब के कवि मरुस्थल में बहतेहुए किसी साधारण से झरने अथवा ताड़ के लंबे-लंबे पेड़ों में ही सौन्दर्य का अनुभव कर लेते हैं तथा ऊँटों की चाल में ही सुन्दरता की कल्पना कर लेते हैं, परन्तु जिन्होंने भारत की हिमाच्छादित शैलमाला पर संध्या की सुनहली किरणों की सुषमा देखी हैं अथवा जिन्हें घनी अमराइयों की छाया में कल-कल ध्वनि से बहती हुई निर्झरिणी तथा उसकी समीपवर्तिनी लताओं की वसन्तश्री देखने का अवसर मिला है, साथ ही जो यहाँ के विशालकाय हाथियों की मतवाली चाल देख चुके हैं, उन्हें अरब की उपर्युक्त वस्तुओं में सौन्दर्य तो क्या, उलटे नीरसता, शुष्कता और भद्दापन ही मिलेगा। भारतीय कवियों को प्रकृति की सुन्दर गोद में क्रीड़ा करने का सौभाग्य प्राप्त है। ये हरे-हरे उपवनों तथा सुन्दर जलाशयों के तटों पर विचरण करते तथा प्रकृति के नाना मनोहारी रूपों से परिचित होते हैं। यही कारण है कि कहाँ के कवि मरुस्थल में भी सौन्दर्य का अनुभव कर लेते है?
निर्देशः गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। गिजुभाई ने केवल बच्चों की क्षमताओं, बैद्धिकता में विश्वास व्यक्त करते हैं अपितु वे उनकी सर्जनात्मकता में भी अगाध आस्था रखते हैं। उनके अनुसार कुछ हत्याएँ पीनल कोड की धारा के अधीन नहीं आती। उनमें कानूनवेत्ताओं की न्याय नीति-संबंधी मर्यादाएँ सिर्फ पीनल कोड से बँधी होती हैं। शिक्षाशास्त्रियों के पास राज्य, रूढ़ि अथवा धर्म की कोई सत्ता नहीं है इसलिए जीवन के प्रति जो अपराध होते हैं उनके लिए न कोई पीनल कोड, न कोई उन्हें निंदनीय मानता, न कोई धार्मिक भय है। जीवन के प्रति होने वाला एक ऐसा ही अपराध है- बालक की सृजन-शक्ति की हत्या। ईश्वर ने मनुष्य का सृजन किया और उसे अपनी सृजन-शक्ति प्रदान की। मनुष्य के सृजन की अनंत शक्ति के समान ही अगणित है। साहित्य एक सृजन है, चित्रकला दूसरा सृजन है, संगीत तीसरा सृजन है और स्थापत्य चौथा सृजन है। इस तरह गिनने बैठा जाए तो मनुष्य के द्वारा बनाई गई अनेकानेक कृतियों को गिनाया जा सकता है। जब शिक्षक या अभिभावक यह तय करते हैं कि बच्चे को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए वस्तुतः इन निर्णयों में ही वे बालक की सृजन-शक्ति का दमन कर देते हैं। बौद्धिक, ऐतिहासिक शब्दों में मूल शब्द तथा प्रत्यय हैं:
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये वायु प्रदूषण आज की प्रमुख समस्या है। जंगलों के कटने तथा खनिज ईंधन के जलने से वायु में कार्बन डाई-ऑक्साइड की मात्रा दिनों बढ़ रही है। विश्व पर्यावरण विकास आयोग' के अनुसार औद्योगीकरण के पूर्व वायु के प्रति 10 लाख में 280 कार्बन डाई-ऑक्साइड' थी। यह घनत्व अस्सी के दशक में 340 पहुंच गया तथा इक्कीसवीं शताब्दी के मध्य से अन्त तक यह 560 तक पहुंच जाएगा। वातावरण में छोड़ा जाने वाला धुआं अब सामान्य लकड़ी का धुआं न होकर अब उसमें कार्बन-ऑक्साइड के साथ-ही-साथ नाइट्रसऑक्साइड, धूल जैसे पदार्थों का आधिक्य भी हो रहा है। धातु कणों में सीसा, पारा, निकल, क्रोमियम, तांबा, आदि होते हैं। सीसे के जहर से मानव मस्तिष्क के तन्तु नष्ट हो जाते हैं। सीसे का जहर किस अंग के तन्तुओं को नष्ट कर देता है।
निम्नलिखित पद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मानव के लिए विचार तथा अनुभव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उदात्त है व इसका अथवा उसका नहीं है जातिगत अथवा देशगत नहीं है, वह सबका है, सारे विश्व का है। समस्त ज्ञान, विज्ञान और सभ्यता, सारी मानवता की विरासत है। पूर्व और पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के भेद, अक्षांश और देशान्तर का भेद तथा जलवायु और भौगोलिक सीमा के भेद सर्वथा निराधार हैं। सम्प्रदाय, समुदाय और जाति के नाम पर आदशौं, मूल्यों की स्थापना करना, संकीर्णता के वातावरण में मानवता के दम घोंटना-सा है। जो कुछ भी उपलब्धि है, वह चाहे जिस भू-भाग की उपज हो। महापुरुष विरोधी नहीं होते, एक-दूसरे के पूरक होते हैं। महापुरुष में अपने देश की विशेषता होती है। विवेकशील मनुष्य नम्रतापूर्वक महापुरुषों से शिक्षा ग्रहरण कर अपने जीवन को प्रकाशित करने का प्रयत्न करता है। समस्त मानवता उसके प्रति कृतज्ञ है। किन्तु अब हमें उनसे आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि ज्ञान की इतिश्री नहीं होती। संसार एक खुली पाठशाला है, जीवन एक खुली पुस्तक है, विकास की क्रिया के मूल में मानव की पूर्ण बनने की अपनी प्रेरणा है। विकास के लिए समन्वय का भाव होना परम आवश्यक है। यदि हम विभिन्न विचारधाराओं एवं उनके जन्मदाता महापुरुषों का पूर्ण खण्डन करें तो विकास अवरुद्ध हो जायेगा। किसी धर्म विशेष या मान्यता के खूटे के साथ संकीर्ण भाव से बंधकर तथा परम्पराओं और रूढ़ियों से जकड़े हुए हम आगे नहीं बढ़ सकते। मानव को मानव रूप में सम्मानित करके ही हम जातीयता, प्रान्तीयता, क्षुद्र राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता के भेद को तोड़ सकते हैं। आज मानव, मानव से दूर हटता जा रहा है। वह भूल चुका है कि देश, धर्म और जाति के भिन्न होते हुए भी हम सर्वप्रथम मानव हैं और समान हैं तथा सभी की भावनाएं और लक्ष्य एक ही हैं। सत्ताधारी मनुष्य दूसरों को कुचलकर सुख- सुवध ाओं पर एकाधिकार कर लेना चाहता है लेकिन एक आकाश के नीचे रहने वाले इन्सान तो सब एक हैं भले ही कोई कुदाल लेकर श्रमिका का कार्य करता हो, कोई कलम लेकर दफ्तर का, किन्तु लक्ष्य एक है- समाज का अभ्युदय। मानव का नाता श्रेष्ठ नाता है। नौकर कहकर पुकारना मानो मानव का अपमान है। सहयोगी, सहायक अथवा सस्नेह उसके नाम से सम्बोधित करना मधुर है। जेल और फांसी का विध र मानवता का कलंक है। एक सीमा एक दण्ड भी आवश्यक होता है, लेकिन दण्ड का आतंक समाज को पंगु बना देता है। हमें अपराध वृत्ति का शमन करके अपराधी को शिष्ट एवं सभ्य मानव बनाना चाहिए। दया मानवता का सार है। दया छोड़कर सत्य भी सत्य नहीं है। दया प्रेरित असत्य भी व्यावहारिक सत्य नहीं है। दया धर्म मानवधर्म हैं। . प्रस्तुत गद्यांश मुख्यतः किस भावना से ओतप्रोत है?
निम्नलिखित पद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मानव के लिए विचार तथा अनुभव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उदात्त है व इसका अथवा उसका नहीं है जातिगत अथवा देशगत नहीं है, वह सबका है, सारे विश्व का है। समस्त ज्ञान, विज्ञान और सभ्यता, सारी मानवता की विरासत है। पूर्व और पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के भेद, अक्षांश और देशान्तर का भेद तथा जलवायु और भौगोलिक सीमा के भेद सर्वथा निराधार हैं। सम्प्रदाय, समुदाय और जाति के नाम पर आदशौं, मूल्यों की स्थापना करना, संकीर्णता के वातावरण में मानवता के दम घोंटना-सा है। जो कुछ भी उपलब्धि है, वह चाहे जिस भू-भाग की उपज हो। महापुरुष विरोधी नहीं होते, एक-दूसरे के पूरक होते हैं। महापुरुष में अपने देश की विशेषता होती है। विवेकशील मनुष्य नम्रतापूर्वक महापुरुषों से शिक्षा ग्रहरण कर अपने जीवन को प्रकाशित करने का प्रयत्न करता है। समस्त मानवता उसके प्रति कृतज्ञ है। किन्तु अब हमें उनसे आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि ज्ञान की इतिश्री नहीं होती। संसार एक खुली पाठशाला है, जीवन एक खुली पुस्तक है, विकास की क्रिया के मूल में मानव की पूर्ण बनने की अपनी प्रेरणा है। विकास के लिए समन्वय का भाव होना परम आवश्यक है। यदि हम विभिन्न विचारधाराओं एवं उनके जन्मदाता महापुरुषों का पूर्ण खण्डन करें तो विकास अवरुद्ध हो जायेगा। किसी धर्म विशेष या मान्यता के खूटे के साथ संकीर्ण भाव से बंधकर तथा परम्पराओं और रूढ़ियों से जकड़े हुए हम आगे नहीं बढ़ सकते। मानव को मानव रूप में सम्मानित करके ही हम जातीयता, प्रान्तीयता, क्षुद्र राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता के भेद को तोड़ सकते हैं। आज मानव, मानव से दूर हटता जा रहा है। वह भूल चुका है कि देश, धर्म और जाति के भिन्न होते हुए भी हम सर्वप्रथम मानव हैं और समान हैं तथा सभी की भावनाएं और लक्ष्य एक ही हैं। सत्ताधारी मनुष्य दूसरों को कुचलकर सुख- सुवध ाओं पर एकाधिकार कर लेना चाहता है लेकिन एक आकाश के नीचे रहने वाले इन्सान तो सब एक हैं भले ही कोई कुदाल लेकर श्रमिका का कार्य करता हो, कोई कलम लेकर दफ्तर का, किन्तु लक्ष्य एक है- समाज का अभ्युदय। मानव का नाता श्रेष्ठ नाता है। नौकर कहकर पुकारना मानो मानव का अपमान है। सहयोगी, सहायक अथवा सस्नेह उसके नाम से सम्बोधित करना मधुर है। जेल और फांसी का विध र मानवता का कलंक है। एक सीमा एक दण्ड भी आवश्यक होता है, लेकिन दण्ड का आतंक समाज को पंगु बना देता है। हमें अपराध वृत्ति का शमन करके अपराधी को शिष्ट एवं सभ्य मानव बनाना चाहिए। दया मानवता का सार है। दया छोड़कर सत्य भी सत्य नहीं है। दया प्रेरित असत्य भी व्यावहारिक सत्य नहीं है। दया धर्म मानवधर्म हैं।विकास के लिए क्या आवश्यक है?
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