मानव नर जनन तंत्र निम्नलिखित अंगो से मिलकर बना होता है - ,
(1) वृषण - ये प्राथमिक नर जनन अंग होते है। ये कोमल अंडाकार कि संरचनाएँ `5 cm xx 2.5 cm xx 3 cm ` के आकार कि होती है ।
ये थैलीनुमा संरचना में बंद होती है जिन्हे वृषण कोश कहते है। वृषण कोश उदर गुहा के बाहर टाँगो के बीच स्थित होते है।
कार्य - (1 ) वृषण शुक्राणु उत्पन्न करते है जिन्हे नर जनन कोशिकाएँ कहते है।
(2) ये नर लैगिंग हार्मोन टेस्टोस्टेरोन स्त्रावित करते है।
(3) वृषण कोश ताप नियंत्रक के रूप में कार्य करते है क्योंकि शुक्राणुओं के बनने के लिए शरीर के ताप `( 37^(@)C)` से `1-3^(@)C` न्यून ताप कि आवश्यकता होती है।
2. अधिवृषण - ये लगभग 6 cm लम्बी अति कुंडलित नलिकाएँ होती है जो वृषण के साथ जुड़ी होती है।
कार्य - ये वृषण से शुक्राणु ग्रहण करती है तथा स्खलन से पहले अस्थायी रूप से संचित करके रखती है।
3. शुक्रवाहिनी - प्रत्येक शुक्रवाहिनी एक लम्बी नलिका होती है जिसकी भित्ति मोटी व पेशीय होती है। यह उदर गुहा में एक नली के माध्यम से प्रवेश करती है जिसे इनगुइनल कैनाल कहते है।
कार्य - (1) यह एपिडिडाईमस से शुक्राणुओं को लेकर जाती है
(2) यह शुक्राशय नलिका के साथ मिलकर स्खलन नलिका बनाती है।
4. स्खलन नलिका - प्रत्येक नलिका एक छोटी पतली नलिका होती है जो गदूद ( प्रोस्टेट ग्रंथि ) में से होकर गुजरती है तथा मूत्रमार्ग में खुलती है। मूत्रमार्ग शिश्न में से होकर शिश्न कि चोटी पर नर जनन छिद्र के रूप में खुलती है ।
5. शिशन - यह एक सिलेंडर कि आकृति का स्पंजी , पेशीय तथा अतिरक्त संचरित अंग है ।
कार्य -(1) इसे लैंगिक कार्य के लिए उपयोग किया जाता है तथा योनि में शुक्राणुओं को जमा करने के लिए भी ।
(2) इस मूत्र को शरीर से बाहर निकलने के लिए भी प्रयोग किया जाता है।