तालाबीय पारिस्थितिकी के जीवीय घटक-इसमें अंतर्गत उत्पादक, उपभोक्ता एवं अपघटक आते हैं।
(i) (i) उत्पादक-इसके उत्पादक सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। तालाब में मिलने वाले पादपप्लवक (phytoplankton), विभिन्न प्रकार के शैवाल जैसेस्पाइरोगाइरा (Spirogyra), यूलोथ्रिक्स (Ulothrix), कलैडोफोरा (Cladophora), आइडोगोनियम (Oedogonium), डायटम (Diatoms) आदि उत्पादक का कार्य करते हैं।
(ii) उपभोक्ता (Consumer)-जल में पाए जाने वाले छोटे कीट, जैसे कोपीपोड्स (copepods), प्रोटोजोअन्स (protozoans), क्रस्टेशियन्स (crustaceans) आदि शैवालों को खाते हैं। ये सभी प्राणिप्लवक (zooplankton), के रूप में प्राथमिक उपभोक्ता का कार्य करते हैं। इन प्राणिप्लवकों को कीट, भंग (beetle), मोलस्कन्स (molluscs) आदि खाते हैं जो द्वितीयक उपभोक्ता कहलाते हैं। तृतीयक उपभोक्ताओं की श्रेणी में छोटी और बड़ी मांसाहारी मछलियाँ पाई जाती हैं।
(iii) अपघटक (Decomposers)-तालाब के जल तथा तह में अनेक प्रकार के जीवाणु, कवक एवं एक्टीनोमाइसिज पाए जाते हैं, जो अपघटक का कार्य करते हैं। ये सड़ी-गली पत्तियों एवं मृत जीवों का अपघटन कर जटिल कार्बनिक पदार्थों को पुन: कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस, कैल्शियम आदि तत्वों में परिवर्तित कर जल एवं मृदा में वापस कर देते हैं।
ये ऑक्साइड्स मुक्त होते रहते हैं। ये हवा में मौजूद जल से संयुक्त होकर सल्फ्यूरिक अम्ल (`H_2SO_4`) एवं नाइट्रिक अम्ल (`HNO_3`) बनाते हैं। वर्षा के जल के साथ ये अम्लीय वर्षा के रूप में पृथ्वी पर गिरते हैं। अम्लीय वर्षा में सल्फ्यूरिक अम्ल की मात्रा नाइट्रिक अम्ल की अपेक्षा अधिक होती है।
अम्लीय वर्षा का धरती तथा जलाशयों में रहने वाले जीव-जंतुओं पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इससे मकानों, स्मारकों, पुलों, सड़कों आदि में क्षरण होने लगता है। अम्लीय वर्षा के कारण भारी धातु जैसे शीशा, कॉपर, मैंगनीज, ऐल्युमीनियम, जस्ता, कैडमियम आदि अधिक जमा हो जाते हैं जो जीवों के लिए हानिकारक होते हैं।