आर्थिक वस्पति विज्ञान की परिभाषा दीजिये तथा इसके महत्व समझाइये |
आर्थिक वस्पति विज्ञान की परिभाषा दीजिये तथा इसके महत्व समझाइये |
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The table given below presents the number of books on different subjects kept on separate shelves. Subjects with odd and even numbers are of Arts and Science respectively. नीचे दी गयी तालिका अलग-अलग विषयों की पुस्तकों की संख्या को दर्शाता है जिन्हें अलग-अलग खानों में रखा गया है | विषम तथा सम संख्या के विषय क्रमशः कला एवं विज्ञान हैं | The number of books of S3 is what percent (correct to one decimal place) of the average number of Science books? S3 के पुस्तकों की संख्या विज्ञान की पुस्तकों की औसत संख्या ( एक दशमलव स्थान तक ) का कितना प्रतिशत है ?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। मानव की कुशलता, लगन और समर्पण पर क्या निर्भर करता है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। मनुष्य अपने विकास के लिए क्या करता है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। गांधीजी ने किस पर जोर दिया?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। गद्यांश के अनुसार कौन-सा विकास का ध्येय नहीं है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। गद्यांश के अनुसार कहा जा सकता है कि
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। किस शब्द में "इक' प्रत्यय का प्रयोग नहीं हो सकता है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। निम्नलिखित में से कौन-सा संज्ञा शब्द नहीं है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। मनुष्य अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके अपनी विविध आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं मितव्ययितापूर्वक उपयोग मानव की कुशलता, लंगन एवं समर्पण पर निर्भर है। प्रकृति के अमूल्य उपहारों, जैसे- वन, जल, खनिज आदि को अपने कल्याण के लिए संपूर्ण प्रयोग करना मानव-मात्र की इच्छा शक्ति व तर्क पर निर्भर है। मानव की प्रगति के सतत विकास का महत्व गांधीजी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। इसलिए सतत विकास हेतु मानव की आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर संसाधनों के संरक्षण पर जोर दिया। विकास का ध्येय जीवन के आर्थिक ही नहीं वरन् ‘सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाना होना चाहिए। प्रकृति से संस्कृति की ओर बढ़ने की आकांक्षा हमेशा होनी चाहिए। जहाँ इस आकांक्षा की पूर्ति होगी उसे इतिहास में स्वर्ण युग का नाम देना उचित होगा न कि साहित्य और कला की तरक्की का। इस दृष्टि से अभी तक भारत का स्वर्ण युग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। भारत स्वर्णे युग दूर-दूर तक इसलिए दिखाई नहीं देता, क्योंकि
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