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अंक 1,2,3,4,5 के प्रयोग द्वारा कितनी 4 ...

अंक 1,2,3,4,5 के प्रयोग द्वारा कितनी 4 अंकीय संख्याएँ बनाई जा सकती है । यदि कोई भी अंक दोहराया नहीं गया है । इनमें से कितनी सम संख्याएँ होगी ।

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The sum of the digits of a two-digit number is 1/7 of the number. The units digit is 4 less than the tens digit. If the number obtained on reversing its digit is divided by 7, the remainder will be: दोअंकों की एक संख्या के अंकों का जोड़ संख्या का 1/7 है | इकाई अंक दहाईं के अंक से 4 कम है | यदि इसके अंकों को पलटने से बनी संख्या को 7 से भाग दिया जाए, तो शेषफल होगा :

There are three positive numbers. If the average of any two of them is added to the third number, the sums obtained are 68, 74 and 98. What is the average of the smallest and the greatest of the given numbers? तीन धनात्मक संख्याएँ हैं | यदि इनमें से किसी भी दो संख्या का औसत तीसरी संख्या में जोड़ा जाए, तो योगफल के रूप में क्रमशः 68, 74 और 98 प्राप्त होता है | इनमें से सबसे छोटी और सबसे बड़ी संख्या का औसत ज्ञात करें |

गद्यांश को पढ़कर प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। आसमान में मुक्का मारना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं समझा जाता। बिना लक्ष्य के तर्क करना भी बुद्धिमानी नहीं है। हमें भली-भाँति समझ लेने की आवश्यकता है, कि हमारा लक्ष्य क्या है? हम जो कुछ प्रयत्न करने जा रहे हैं वह किसके लिए हैं? साहित्य हम किसके लिए रचते हैं, इतिहास और दर्शन क्यों लिखते और पढ़ते हैं? राजनीतिक,आन्दोलन किस महान् उद्देश्य की सिद्धि के लिए करते हैं? मनुष्य ही वह बड़ी चीज़ है जिसके लिए यह सब किया करते हैं। हमारे सब प्रयत्नों का एक लक्ष्य है, मनुष्य वर्तमान दुर्गति के पंक से उद्धार पाए और भविष्य में सुख और शांति से रह सके। यह शास्त्र, ग्रंथ, कला, नृत्य, राजनीति, समाज-सुधार जंजाल-मात्र हैं, जिससे मनुष्य का भला नहीं होता। मनुष्य आज हाहाकार के भीतर त्राहि-त्राहि पुकार रहा है। हमारे राजनीतिक और समाजिक सुधार से अन्न-वस्त्र की समस्या सुलझ सकती है फिर भी मनुष्य सुखी नहीं बनेगा। उसे सिर्फ अन्न-वस्त्र से ही संतोष नहीं होगा। इसके बाद भी उसका मनुष्य बनना बाकी रह जाता है। साहित्य वही काम करता है। मनुष्य नामक प्राणी पशुओं में ही एक विकसित प्रजाति है और यदि मनुष्यता के गुण और मूल्य उसमें नही हैं तो वह मनुष्य नामक पशु ही है, मनुष्य नहीं। भोजन करना, सोना और वंश-वृद्धि जैसे काम प्रकृति के द्वारा तय है, सच्चा मानव बनने के लिए उसे जो दृष्टि चाहिए, उसे पाने में साहित्य सहायक हो सकता है। अन्न-वस्त्र आदि की समस्याएँ हल हो सकती हैं

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