Home
Class 12
PHYSICS
1.5 मीटर लम्बी धातु की एक छड़ अपने एक सिर...

1.5 मीटर लम्बी धातु की एक छड़ अपने एक सिरे के परितः 20 चक्कर/सेकण्ड की दर से चुम्बकीय याम्योत्तर के लम्बवत ऊर्ध्वाधर तल में घूम रही है छड़ के सिरों के बीच प्रेरित विधुत वाहक बल ज्ञात कीजिये । (`B_(H)=0.32` गौस)

Promotional Banner

Similar Questions

Explore conceptually related problems

एक आयत की लम्बाई x, 5 cm / min की दर से घट रही है और चौड़ाई y, 4 cm / min कि दर से बढ़ रही है जब x=8 cm और y= 6 cm है तब आयत के (a) परिमाप (b) क्षेत्रफल की परिवर्तन की दर ज्ञात कीजिए

एक आयत की लम्बाई x, 5 cm / min की दर से घट रही है और चौड़ाई y, 4 cm / min कि दर से बढ़ रही है जब x=8 cm और y= 6 cm है तब आयत के (a) परिमाप (b) क्षेत्रफल की परिवर्तन की दर ज्ञात कीजिए

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। क्रान्तिकारी शब्द है

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। गोदान' का नायक कौन है?

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। गोदान में निम्नलिखित में से किसका वर्णन नहीं है?

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। होरी को कौन-सी इच्छा अधूरी रह जाती है?

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। प्रेमचन्द के अनुसार

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। गोदान में

गोदान' प्रेमचन्द जी का एक ऐसा क्रान्तिकारी उपन्यास है, जिसमें तत्कालीन युग अपनी समस्त विकृतियों, विडम्बनाओं एवं सच्चाइयों के साथ चित्रित हो गया है। उसमें अपने समय का यथार्थ ही चित्रित नहीं हुआ है वरन् तत्कालीन भारतीय कृषक वर्ग का इतिहास भी संरक्षित हुआ है। प्रेमचन्द जी अपने युग और उसकी परिस्थितियों से पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण छोटे-छोटे प्रसंग भी उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहे हैं। अपने समाज की यह पहचान और इसे औपन्यासिक परिस्थितियों से अनुस्यूत कर देने की क्षमता बिरले लोगों में ही होती है। वे यह जानते थे कि एक निष्क्रिय समाज पतन के लिए किस बिन्दु पर खड़ा है तथा वही समाज सामाजिक जागृति पाकर जब जागता है, तो वह किस तरह अपने अतीत और वर्तमान के संकटों के बीच भविष्य के प्रति आशावादी होता है। सामाजिक चेतना के महीन बिन्दुओं को, उन सामाजिकों के बीच प्रेमचन्द ने पहचाना था, जिन्होंने उस चेतना को स्वाभाविक रूप में प्राप्त किया। डॉ। गंगा प्रसाद विमल इसी प्रसंग में लिखते हैं---उपन्यास कथा, होरी जैसे साधारण किसान को केन्द्र बनाकर चलती है, किन्तु केन्द्रीय कथा में होरी मात्र नायक के रूप में ही प्रस्तावित नहीं है, अपितु वह स्वयं एक कथा सत्य के रूप में स्थापित होता है। होरी की कथा में नगर एवं गाँव दोनों के अर्थतन्त्र का खुला हिसाब प्रतीत होता है, परन्तु इन आधारों पर गोदान केवल ₹ एक विचारकथा या समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि वह मानवीय संघर्ष की कथा है। ऐसी कथा जिसमें स्वाधीनता युग की स्वर क्रान्ति की लहरी का ज्वार भी है, तो सारी लड़ाई का पराजय बोध भी। वस्तुत: पराजय बोध के केन्द्र से यदि हम इस कथा कृति का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि गोदान में एक सच्ची त्रासदी की तस्वीर अवतरित हुई है। उपन्यास का नायक होरी इतना दीन-हीन किसान है कि उसके माध्यम से भारतीय कृषक वर्ग की करुणा और मार्मिक जीवन-यात्रा की सजीव झाँकी प्रस्तुत हो गई है। भारतीय किसान ऋण में ही पैदा होता है, ऋण में ही जीवित रहता है और अपने उत्तराधिकारी पर ऋण का भार छोड़कर मर जाता है। मरते समय उसके पास एक गाय तक नहीं रहती। गोदान उपन्यास ऐसे ही भारतीय किसान के जीवन को करुण त्रासदी है। माय की आकांक्षा होरी के जीवन का सबसे मधुर स्वप्न उसके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। अपनी यह आकांक्षा पूरी करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठा सकता है पर पूँजीवादी शोषणचक्र उसकी अभिलाषा को पीस डालता है। अन्त में इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह ऐसा जी-तोड़ परिश्रम करता है, जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है और वह गाय की अभिलाषा मन में ही लिए मृत्यु का वरण कर लेता है। 'निष्क्रिय' शब्द का प्रयोग प्रस्तुत गद्यांश में किसके लिए किया गया है?

Recommended Questions
  1. 1.5 मीटर लम्बी धातु की एक छड़ अपने एक सिरे के परितः 20 चक्कर/सेकण्ड की ...

    Text Solution

    |

  2. 10 g द्रव्यमान और 50 m/s चाल वाली बंदूक की गोली एक दरवाजे में अंतः स्...

    Text Solution

    |

  3. 30 सेमी लम्बी एक छड़ AB दो लम्ब अक्षो पर इस प्रकार फिसलती है की छड़ का...

    Text Solution

    |

  4. एक 40 cm लम्बी चालक छड़ 0.5 T के चुम्ब्कीय क्षेत्र के लम्बवत रखा है तथा...

    Text Solution

    |

  5. L लम्बाई की एक छड़ जिसके सिरे दो परस्पर लम्ब रेखाओं पर स्थित है , फि...

    Text Solution

    |

  6. एक फूलों की क्यारी, जो एक वृत्त के त्रिज्याखण्ड के रूप में है, की घेरा...

    Text Solution

    |

  7. एक समबाहु त्रिभुज की भुजाएँ 2 सेमी/से की दर से बढ़ रही है। क्षेत्रफल क...

    Text Solution

    |

  8. एक अकेले चुम्बकीय ध्रुव के कारण चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता | चुम्बकीय...

    Text Solution

    |

  9. कॉलम - I में कुछ निश्चित स्थितियां दी गई है जिनमे प्रतिरोध का सीधा धा...

    Text Solution

    |