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BIOLOGY
किसी ऐसे संक्रमणकारी कारक का नाम बताइए ज...

किसी ऐसे संक्रमणकारी कारक का नाम बताइए जिसमें न तो डी. एन. ए. होता है और न ही आर. एन. ए. ।.

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Marked price of an article is 20% more than its cost price. At what percent less should it be sold for no profit and no loss? एक वस्तु का अंकित मूल्य उसकी लागत मूल्य से 20% अधिक है। इसे कितने प्रतिशत कम पर बेचा जाना चाहिए ताकि न तो लाभ हो और न ही हानि ?

जीवन में बहुत अंधकार है और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है। कुछ लोग इस अंधकार को स्वीकार कर लेते हैं और तब उनके भीतर जो प्रकाश तक पहुँचने और पाने की आकांक्षा थी, वह । क्रमशः क्षीण होती जाती है। मैं अंधकार को इस स्वीकृति को मनुष्यों ही का सबसे बड़ा पाप कहता हूँ। यह मनुष्य का स्वयं अपने प्रति किया । गया अपराध है। उसके दूसरों के प्रति किए गए अपराधों का जन्म इस मूल पाप से ही होता है। यह समर्पण रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह किसी के भी प्रति कोई पाप न नहीं कर.सकता है। किन्तु कुछ लोग अंधकार के स्वीकार से बचने । के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है। जीवन में बहुत अंधकार है। रेखांकित अंश में कौन-सा कारक है

जीवन में बहुत अंधकार है और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है। कुछ लोग इस अंधकार को स्वीकार कर लेते हैं और तब उनके भीतर जो प्रकाश तक पहुँचने और पाने की आकांक्षा थी, वह । क्रमशः क्षीण होती जाती है। मैं अंधकार को इस स्वीकृति को मनुष्यों ही का सबसे बड़ा पाप कहता हूँ। यह मनुष्य का स्वयं अपने प्रति किया । गया अपराध है। उसके दूसरों के प्रति किए गए अपराधों का जन्म इस मूल पाप से ही होता है। यह समर्पण रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह किसी के भी प्रति कोई पाप न नहीं कर.सकता है। किन्तु कुछ लोग अंधकार के स्वीकार से बचने । के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है। ''_____ और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है।" वाक्य में निपात है

जीवन में बहुत अंधकार है और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है। कुछ लोग इस अंधकार को स्वीकार कर लेते हैं और तब उनके भीतर जो प्रकाश तक पहुँचने और पाने की आकांक्षा थी, वह । क्रमशः क्षीण होती जाती है। मैं अंधकार को इस स्वीकृति को मनुष्यों ही का सबसे बड़ा पाप कहता हूँ। यह मनुष्य का स्वयं अपने प्रति किया । गया अपराध है। उसके दूसरों के प्रति किए गए अपराधों का जन्म इस मूल पाप से ही होता है। यह समर्पण रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह किसी के भी प्रति कोई पाप न नहीं कर.सकता है। किन्तु कुछ लोग अंधकार के स्वीकार से बचने । के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है। जब व्यक्ति स्वयं के प्रति किए गए अन्याय, शोषण के विरुद्ध आवाज नहीं उठाता तो

जीवन में बहुत अंधकार है और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है। कुछ लोग इस अंधकार को स्वीकार कर लेते हैं और तब उनके भीतर जो प्रकाश तक पहुँचने और पाने की आकांक्षा थी, वह । क्रमशः क्षीण होती जाती है। मैं अंधकार को इस स्वीकृति को मनुष्यों ही का सबसे बड़ा पाप कहता हूँ। यह मनुष्य का स्वयं अपने प्रति किया । गया अपराध है। उसके दूसरों के प्रति किए गए अपराधों का जन्म इस मूल पाप से ही होता है। यह समर्पण रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह किसी के भी प्रति कोई पाप न नहीं कर.सकता है। किन्तु कुछ लोग अंधकार के स्वीकार से बचने । के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है। गद्यांश में 'अंधकार' शब्द किस और संकेत करता है ?

जीवन में बहुत अंधकार है और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है। कुछ लोग इस अंधकार को स्वीकार कर लेते हैं और तब उनके भीतर जो प्रकाश तक पहुँचने और पाने की आकांक्षा थी, वह । क्रमशः क्षीण होती जाती है। मैं अंधकार को इस स्वीकृति को मनुष्यों ही का सबसे बड़ा पाप कहता हूँ। यह मनुष्य का स्वयं अपने प्रति किया । गया अपराध है। उसके दूसरों के प्रति किए गए अपराधों का जन्म इस मूल पाप से ही होता है। यह समर्पण रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह किसी के भी प्रति कोई पाप न नहीं कर.सकता है। किन्तु कुछ लोग अंधकार के स्वीकार से बचने । के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है। 'अंधकार का निषेध' किस ओर संकेत करता है?

जीवन में बहुत अंधकार है और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है। कुछ लोग इस अंधकार को स्वीकार कर लेते हैं और तब उनके भीतर जो प्रकाश तक पहुँचने और पाने की आकांक्षा थी, वह । क्रमशः क्षीण होती जाती है। मैं अंधकार को इस स्वीकृति को मनुष्यों ही का सबसे बड़ा पाप कहता हूँ। यह मनुष्य का स्वयं अपने प्रति किया । गया अपराध है। उसके दूसरों के प्रति किए गए अपराधों का जन्म इस मूल पाप से ही होता है। यह समर्पण रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह किसी के भी प्रति कोई पाप न नहीं कर.सकता है। किन्तु कुछ लोग अंधकार के स्वीकार से बचने । के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है। इस गद्यांश का मुख्य उद्देश्य है ।

जीवन में बहुत अंधकार है और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है। कुछ लोग इस अंधकार को स्वीकार कर लेते हैं और तब उनके भीतर जो प्रकाश तक पहुँचने और पाने की आकांक्षा थी, वह । क्रमशः क्षीण होती जाती है। मैं अंधकार को इस स्वीकृति को मनुष्यों ही का सबसे बड़ा पाप कहता हूँ। यह मनुष्य का स्वयं अपने प्रति किया । गया अपराध है। उसके दूसरों के प्रति किए गए अपराधों का जन्म इस मूल पाप से ही होता है। यह समर्पण रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह किसी के भी प्रति कोई पाप न नहीं कर.सकता है। किन्तु कुछ लोग अंधकार के स्वीकार से बचने । के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है। लेखक ने किसे सबसे बड़ा पाप कहा है?

जीवन में बहुत अंधकार है और अंधकार की ही भांति अशुभ और अनीति है। कुछ लोग इस अंधकार को स्वीकार कर लेते हैं और तब उनके भीतर जो प्रकाश तक पहुँचने और पाने की आकांक्षा थी, वह । क्रमशः क्षीण होती जाती है। मैं अंधकार को इस स्वीकृति को मनुष्यों ही का सबसे बड़ा पाप कहता हूँ। यह मनुष्य का स्वयं अपने प्रति किया । गया अपराध है। उसके दूसरों के प्रति किए गए अपराधों का जन्म इस मूल पाप से ही होता है। यह समर्पण रहे कि जो व्यक्ति अपने ही प्रति इस पाप को नहीं करता है, वह किसी के भी प्रति कोई पाप न नहीं कर.सकता है। किन्तु कुछ लोग अंधकार के स्वीकार से बचने । के लिए उसके अस्वीकार में लग जाते हैं। उनका जीवन अंधकार के निषेध का ही सतत उपक्रम बन जाता है। इस गद्यांश में "उपक्रम को अर्थ है