ओम के नियम को प्रयोग द्वारा प्रमाणित करने के लिए सर्वप्रथम चालक तार, आमीटर, वोल्टमीटर, दाब कुंजी, बैटरी, परिवर्तनशील प्रतिरोध इत्यादि लेकर चित्रानुसार सजा दिया जाता है। आमीटर को श्रेणीक्रम तथा वोल्टमीटर को समांतरक्रम में जोड़ा जाता है।
अब दाब कुंजी दबाकर बैटरी से धारा प्रवाहित की जाती है आमीटर (A) से धारा का मान तथा वोल्टमीटर (V) से विभवांतर का मान ज्ञात हो जाता है। परिवर्तनशील प्रतिरोध को स्लाइड पर आगे-पीछे खिसकाकर प्रयोग को बार-बार दुहराता जाता है। अलग-अलग स्थितियों में आमीटर से धारा का मान तथा वोल्टमीटर से विभवांतर का मान ज्ञात कर लिया जाता है। प्राप्त मान को देखने से पता चलता है कि विभवांतर का मान आधा होने पर धारा का मान भी आधा हो जाता है इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि चालक के सिरों के बीच का विभवांतर उस चालक से प्रवाहित होने वाली धारा का सीधा समानुपाती होता है।
अब विभवांतर (V) को x-अक्ष पर तथा धारा (1) को y-अक्ष पर रखकर एक ग्राफ खींचा जाता है तो एक सरल रेखा के रूप में प्राप्त होती है जो ओम के नियम को साबित करती है।
(a) जनित्र (डायनेमा)
(b) (i) = रिंग (ii) = कार्बन ब्रश
(c) यह उपकरण यांत्रिक ऊर्जा को विद्युतीय ऊर्जा में परिवर्तित करता है
(d) जब किसी कुंडली को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है तब विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धान्त के अनुसार कुंडली में प्रेरित धारा उत्पन्न होती है।
यह आयताकार लोहे के ढाँचे पर विद्युतरोधी ताँबे के तार को अनेक चक्करों से लपेट कर बनाई जाती है।