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Class 12
PHYSICS
प्रत्यावर्ती धारा जनित्र का सिद्धान्त तथ...

प्रत्यावर्ती धारा जनित्र का सिद्धान्त तथा कार्य-प्रणाली चित्र द्वारा समझाइए।

लिखित उत्तर

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प्रत्यावर्ती धारा जनित्र अथवा डायनमो-वैद्युत जनित्र (डायनमो) एक ऐसी वैद्युत चुम्बकीय मशीन हैं जो यान्त्रिक ऊर्जा को वैद्युत ऊर्जा में बदलती है। इसका कार्य फैराडे के वैद्युतचुम्बकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर निर्भर है।
सिद्धान्त-जब किसी बन्द कुण्डली को किसी शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र में तेजी से घुमाया जाता है तो उसमें से होकर गुजरने वाली चुम्बकीय फ्लक्स रेखाओं की संख्या में लगातार परिवर्तन होता रहता है. जिसके कारण कुण्डली में एक वैद्युत वाहक बल तथा वैद्युत धारा प्रेरित हो जाती है। कुण्डली को घुमाने में किया गया कार्य अथवा व्यय यान्त्रिक ऊर्जा, कुण्डली में वैद्युत ऊर्जा के रूप में परिणत हो जाती है।

संरचना-इसके निम्नलिखित चार भाग होते हैं -
(1) क्षेत्र चुम्बक-यह एक शक्तिशाली चुम्बक (N-S) होता है। इसका कार्य शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करना है जिसमें कुण्डली घूमती है। इसके द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की बल-रेखाएँ ध्रुव N से S की ओर होती हैं।
(2) आर्मेचर-यह एक आयताकार , कुण्डली abcd होती है, जो कच्चे लोहे के क्रोड पर पृथक्कित ताँबे के तार के बहुत-से फेरों को लपेटकर बनाई जाती है। इसे आर्मेचर कुण्डली भी कहते हैं। इसमें तांबे के फेरों की संख्या अधिक होती है। इस कुण्डली को क्षेत्र चुम्बक के ध्रुव खण्डों N-S के बीच बाह्य शक्ति जैसे स्टीम टरबाइन, वाटर टरबाइन, पेट्रोल इंजन आदि द्वारा तेजी से घुमाया जाता है।
(3) सर्पी वलय-कुण्डली पर लिपटे तांबे के तार के दोनो सिरे धातु के दो छल्लों `S_1` व् `S_2` से जुड़े रहते हैं तथा आमेचर कुण्डली के साथ-साथ उसी अक्ष पर घूमते हैं। इनको सी वलय कहते है। ये छल्ले परस्पर तथा धुरा दण्ड से पृथक्कित रहते हैं।
(4) ब्रुश - सर्पी वलय `S_1,S_2` सदैव ताँबे की बनी दो पत्तियों `b_1, b_2` को स्पर्श करते रहते हैं जिन्हें ब्रुश कहते हैं। ये ब्रुश स्थिर रहते हैं तथा इनका सम्बन्ध उस बाह्य परिपथ से कर देते हैं जिसमें वैद्युत धारा भेजनी होती है।
कार्यविधि-माना आर्मेचर कुण्डली abcd दक्षिणावर्त दिशा में घूम रही है किसी क्षण कुण्डली की भुजा cd नीचे जा रही है तथा भुजा ab ऊपर की ओर - आ रही है। फ्लेमिंग के दाएं हाथ के नियमानुसार, इन भुजाओं में प्रेरित धारा की दिशा के अनुसार होगी। अत: बाह्य परिपथ में वैद्युत धारा बुश `S_2` से जाएगी तथा ब्रुश `S_1` से वापस आएगी। जब कुण्डली अपनी ऊर्ध्वाधर स्थिति से गुजरेगी, तब भुजा ab नीचे की ओर जाना प्रारम्भ करेगी तथा cd ऊपर की ओर जाने लगेगी। अब वैद्युत धारा ब्रुश `S_1` से बाहर जाएगी तथा ब्रुश `S_2` से वापस आएगी। इस प्रकार की धारा को प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं क्योंकि प्रत्येक आधे चक्कर के बाद बाह्य परिपथ में धारा की दिशा बदल जाती है।
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